जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। 50 साल बाद फिर इंसान चांद के पास से गुजरने वाला है। नासा का आर्टेमिस-2 मिशन 1 अप्रैल 2026 को चांद के लिए उड़ान भरेगा। यह अपने लांचिंग पैड तक भी पहुंच गया है। सबसे अहम बात यह है कि इस मिशन को लांच करने से पहले नासा सूरज की निगरानी कर रहा है। सवाल यह है कि जब चांद पर जाना है तो सूरज की निगरानी क्यों की जा रही है।
चांद के पास रहेगा इंसान]
1972 के बाद एक बार फिर इंसान चांद के पास चक्कर काटता नजर आएगा। नासा अपने आर्टेमिस मिशन के जरिए 1 अप्रैल को फिर से नया इतिहास लिखेगा। विशाल स्पेस लांच सिस्टम रॉकेट को फ्लोरिडा के लांच पैड 39 बी पर ले जाया गया है। बता दें कि यह रॉकेट दूसरी बार लांच पैड पर गया है। इससे पहले, मार्च में इसके हीलियम सिस्टम में कुछ तकनीकी खराबी आ गई थी, जिसकी वजह से इसे वापस बुलाना पड़ा था। हीलियम सिस्टम में आई खराबी को दूर करने के बाद अब यह रॉकेट 1 अप्रैल को उड़ान भरने के लिए पूरी तरह तैयार है। बता दें कि इस मिशन पर पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों की निगाहें लगी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि चंद्रमा के चारों ओर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने के मिशन का प्रयास पहली बार किया जा रहा है। बता दें कि नासा का यह स्पेस लॉन्च सिस्टम 98 मीटर ऊंचा और 5,000 टन वजनी है। इसे क्रॉलर-ट्रांसपोर्टर-2 द्वारा ले जाया गया था, जो कैटरपिलर ट्रैक पर चलने वाला एक नीचा, टैंक जैसा वाहन है, जिसे नासा ने 1965 में सैटर्न वी मून रॉकेट को प्रक्षेपण पैड तक धीरे-धीरे ले जाने के लिए बनाया था।
सूरज पर नासा की नजर
अब सवाल उठता है कि जब यह चंद्रमा के आसपास जाने का मिशन है तो सूरज की निगरानी क्यों की जा रही है। इस बारे में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी यानी नाासा का कहना है कि इस मिशन के तहत 50 साल के बाद पहली बार इंसान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से बाहर जाएगा। चांद मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री लगभग 10 दिनों तक चंद्रमा की यात्रा करेंगे। इस दौरान उन पर सबसे बड़ा खतरा सोलर एनर्जेटिक पार्टिकल्स का होगा। ये कण सूरज की सतह पर होने वाले विस्फोटों के दौरान निकलते हैं। इनकी रफ्तार इतनी तेज होती है कि ये एक से भी कम घंटे में अंतरिक्ष यान तक पहुंच सकते हैं। ये कण न सिर्फ यान के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को खराब कर सकते हैं बल्कि अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर की कोशिकाओं को भी डैमेज कर सकते हैं। नासा के ने सूरज के इस खतरे से बचने के लिए एक अनोखा तरीका निकाला है। मंगल यानी लाल ग्रह पर मौजूद परसीवरेंस रोवर इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है। रोवर का मास्टकैम-जेड कैमरा सूरज के उस हिस्से की तस्वीरें क्लिक करेगा, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता। इससे वैज्ञानिकों को उन सनस्पॉट्स का दो हफ्ते पहले ही पता चल जाएगा, जो घूमकर पृथ्वी और चांद की तरफ आने वाले हैं। यह एडवांस वार्निंग वैज्ञानिकों को संभावित सौर तूफानों के लिए तैयार रहने का समय दे देगी। इसके अलावा अंतरिक्ष यात्रियों के बचाव के लिए हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक रेडिएशन असेसमेंट नाम का एडवांस सेंसर भी लगाया गया है। ये सेंसर हर पल रेडिएशन के लेवल चेक करते रहेंगे। अगर रेडिएशन खतरनाक लेवल पर जाता है तो यान अलार्म बजाएगा। ऐसी स्थिति में अंतरिक्ष यात्री अस्थायी सुरक्षा घेरे में चले जाएंगे। बता दें कि मिशन से पहले यात्रियों को इम्प्रोवाइज्ड स्टॉर्म शेल्टर बनाने की ट्रेनिंग दी गई है। वे यान के अन्दर मौजूद सामान और वजन का इस्तेमाल करके एक सुरक्षा दीवार बनाएंगे जिससे सौर कणों के सीधे हमले से बच जाएंगे। बता दें कि नासा ने 2028 तक अमेरिकियों को चंद्रमा पर उतारने के लक्ष्य को बरकरार रखा है।





