जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। भारतीय मिसाइल तकनीक की दुनिया मुरीद हो रही है। आकाश मिसाइल सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ रही है। सबसे पहले आर्मेनिया, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान ने इस मिसाइल की खरीद की। अब फिलीपींस इसे अपनी मरीन कोर में शामिल करना चाहती है। इसके लिए 200 मिलियन डॉलर का आर्डर देने की तैयारी है। इसके अलावा सूडान, वियतनाम, मलेशिया, मिस्र और यूएई जैसे देशों ने भी इस मिसाइल में गहरी रुचि दिखाई है।
रक्षा क्षेत्र में भारत ने नए आयाम स्थापित किए
2014 में मोदी सरकार के आते ही रक्षा क्षेत्र में भारत ने नए आयाम स्थापित किए हैं। एक समय था जब भारत अपनी रक्षा के लिए दूसरों के दरवाजे खटखटाता था। अब हालात यह है कि भारत में निर्मित कई हथियारों की दुनिया भर में मांग है। ऐसे ही मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत विकसित किए आकाश मिसाइल सिस्टम की दुनियाभर में डिमांड है।
30 दिसंबर 2020 को कैबिनेट कमेटी आन सिक्योरिटी ने आकाश के एक्सपोर्ट को मंजूरी दी। 2022 में आर्मेनिया ने भारत के साथ करीब 6,000 करोड़ का बड़ा रक्षा सौदा किया। आर्मेनिया ने अपनी सेना में इस मिसाइल का नाम लुसान रखा। इसके बाद 12 नवंबर 2024 को आकाश की पहली बैटरी आर्मेनिया को सौंपी गई। जून 2025 में दूसरी खेप भी रवाना की गई। इसके बाद 2026 में ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों ने अपनी सुरक्षा के लिए भारत से आकाश मिसाइल सिस्टम हासिल किए। अब फिलीपींस अपनी मरीन कोर के लिए 2026 में 200 मिलियन डॉलर का आॅर्डर देने की तैयारी में है। इसके अलावा सूडान, वियतनाम, मलेशिया, मिस्र और यूएई जैसे देशों ने भी इस मिसाइल में गहरी रुचि दिखाई है।
आकाश मिसाइल का इतिहास
आकाश मिसाइल के विकास के इतिहास की बात करें तो चीन और पाकिस्तान के नापाक होते इरादों को देखते हुए भारत ने इस मिसाइल को विकसित किया है। यह दुश्मन के तेज रफ्तार फाइटर जेट, क्रूज मिसाइलों और हवा से जमीन पर हमला करने वाले हथियारों को रास्ते में ही तबाह कर सकती है। 1984 में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत इसे बनाने का काम शुरू हुआ। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आॅगेर्नाइजेशन (डीआरडीओ) के प्रो. प्रह्लाद रामाराव की लीडरशिप में भारत के इस नए दिव्यास्त्र आकाश को अस्तित्व में लाने का काम शुरू हुआ। छह साल की कड़ी मेहनत के बाद 1990 में आकाश मिसाइल ने अपनी पहली टेस्ट उड़ान भरी। 1997 तक इसके बुनियादी टेस्ट चलते रहे. 2005 और 2006 में ओडिशा के चांदीपुर में दो बड़े टेस्ट हुए। पोखरण के तपते रेगिस्तान में इसकी रफ्तार देखी गई, तो ग्वालियर एयर फोर्स स्टेशन पर इसके इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को परखा गया। जब मिसाइल ने लगातार पांच बार सफलतापूर्व सीधे निशाने साध तो इसे सेना में शामिल किया गया। आकाश की सबसे बड़ी ताकत इसका राजेंद्र रडार है। यह मिसाइल की आंख और दिमाग की तरह काम करता है। यह रडार 60 किलोमीटर दूर से ही टारगेट्स पर नजर रख सकता है। साथ ही, एक साथ 12 पर हमला करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। इसके अलावा इसमें लगा सेंट्रल एक्विजिशन रडार लगा है। यह लंंबी दूरी का संतरी है। 150 से 180 किलोमीटर दूर से ही दुश्मन के 200 जहाजों या मिसाइलों को ट्रैक कर लेता है। यह कमांड सेंटर को अलर्ट भेज देता है। अलर्ट मिलते ही पूरा सिस्टम एक्टिव हो जाता है और पकल झपकते ही टारगेट को निशाना बना लेता है। बता दें कि इसमें चार सेल्फ प्रोपेल्ड लॉन्चर होते हैं। हर लॉन्चर पर 3 मिसाइलें तैनात रहती हैं। यानी समय में यह सिस्टम एक साथ 12 मिसाइलों को दागने के लिए हमेशा तैयार रहता है। इसका वजन 720 किलोग्राम, लंबाई 5.78 मीटर और व्यास 35 सेंटीमीटर है। यह मिसाइल मैक 2.5 की सुपरसोनिक स्पीड से उड़ती है। इसके आगे 55 से 60 किलोग्राम का भारी वॉरहेड लगा होता है। इसमें प्रॉक्सिमिटी फ्यूज होता है। इसका मतलब है कि अगर मिसाइल दुश्मन के विमान के बिल्कुल करीब से भी गुजरे, तो भी यह फटकर उसे नेस्तनाबूद कर देती है। बता दें कि इस मिसाइल के तीन वर्जन आ चुके हैं। इनके नाम आकाश मार्क-15, आकाश प्राइम और आकाश एनजी है।





