जनप्रवाद ब्यूरो टीम। भारत ऐसे डिफेंस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है जिसके सामने दुनिया का हर हथियार फेल हो जाएगा। रूस का एस-400 और 500 हो या थॉड या एच क्यू 9बी इस तरह की सभी आधुनिक प्रणाली ध्वस्त हो जाएंगी। इस हाइपरसोनिक सिस्टम में 3 मिसाइलें होंगी। जिससे हवा, पानी और आसमान अभेद्य किला बन जाएगा। इसे त्रिदेव कहा जा रहा है। इसके सामने चीन-पाकिस्तान जैसे देशों की हालत खराब होनी तय है।
पूरी दुनिया में हथियारों की होड़
अमेरिका, इजरायल और ईरान की जंग से एक बार फिर पूरी दुनिया में हथियारों की होड़ मच गई है। हर देश खतरनाक से खतरनाक मिसाइलें बनाने के बारे में जुट गए हैं। अब सबसे अहम बात यह है कि दुश्मन की इन खतरनाक मिसाइलों से कैसे खुद को बचाया जा सके। इसके लिए एशिया में भारत समेत चीन से लेकर तमाम देश अपनी क्षमताओं के अनुसार डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने में लग गए हैं। बदलती आधुनिक युद्धशैली के अनुसार सभी देश खुद को ढाल रहे हैं। इस आधुनिक युद्धशैली में फाइटर जेट, मिसाइल और ड्रोन की भूमिका बेहद अहम हो चुकी है। ईरान की कम लागत वाली शाहेद ड्रोन ने अमेरिका और इजरायल को गहरे जख्म दिए हैं। वहीं, अमेरिका-इजरायल की घातक मिसाइलों ने ईरान को तबाही की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है। यही वजह है कि अब यूरोप के साथ ही जापान जैसे देश भी अपनी सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद हो गए हैं। भारत भी इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहता है। भारत ने नेशनल एयर डिफेंस सिस्टम प्रोजेक्ट मिशन सुदर्शन चक्र पर काम शुरू हो चुका है। इसके पूरा होने के बाद भारत एक ऐसा सिस्टम डेवलप करेगा जिसके प्रहार के सामने एस-400, थॉड और एच क्यू 9 बी ड्रोन डोम जैसे आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली भी पस्त हो जाएगी।
रक्षा विशेषज्ञ कह रहे हैं त्रिदेव
रक्षा विशेषज्ञ इसे त्रिदेव कह रहे हैं। इस हाइपरसोनिक सिस्टम में 3 मिसाइलें होंगी, जिससे हवा, पानी और आसमान अभेद्य किला बन जाएगा। भारत के इस त्रिदेव के सामने चीन-पाकिस्तान जैसे देशों की हालत खराब होनी तय है। इसमें ध्वनि हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल लगेगा। यह भारत के लिए एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है। यह लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम है। साथ ही परमाणु पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है। इसकी रफ्तार मैक-5 से कहीं अधिक बताई जा रही है। इसकी रेंज करीब 10,000 किलोमीटर तक हो सकती है। खास बात यह है कि यह ऊपरी वायुमंडल में अनियमित रास्तों पर ग्लाइड करता है। इसे ट्रैक और इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल है। 2026 के दौरान इसके ट्रायल में हीट-रेजिस्टेंट मैटेरियल, टार्गेटिंग सॉफ्टवेयर और अंतिम चरण की नेविगेशन सिस्टम की विश्वसनीयता पर फोकस किया जा रहा है।





