मंगल ग्रह का निकला सहारा रेगिस्तान में मिला गुलाबी पत्थर, मंगल पर पानी के दे दिया संकेत

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। सहारा रेगिस्तान में मिले गुलाबी पत्थर ने वैज्ञानिकों की धकधकी बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार 4 अरब साल पुराना यह पत्थर मंगल ग्रह का निकला। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें मंगल ग्रह पर पानी मिलने के संकेत मिले हैं। अब नए शोध में मंगल ग्रह पर जीवन को लेकर एक नई थ्योरी सामने  आने वाली है।
मंगल पर पानी की होगी खोज

पूरे ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा भी कहीं जीवन मौजूद है? यह एक ऐसा सवाल है जो सदियों से वैज्ञानिकों और आम लोगों के दिमाग में घूम रहा है। किसी भी ग्रह पर जीवन की संभावना तलाशने के लिए वैज्ञानिक सबसे पहले वहां पानी की मौजूदगी का पता लगाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जल को जीवन का मुख्य आधार माना जाता है। इस कड़ी शोधकर्ताओं को नए नई सफलता मिली है। उनके अनुसार सहारा रेगिस्तान में मिला गुलाबी पत्थर मंगल ग्रह का निकला है। 800 ग्राम के पत्थर में पानी के निशान मिल है। यह 4.1 अरब साल पुरान बताया जा रहा है। नासा की मदद से इस गुलाबी पत्थर पर रिसर्च हुई है। जांच में इस चट्टान में ऐसे खनिज मिले हैं, जो बताते हैं कि मंगल के शुरूआती दौर में उसकी चट्टानों के संपर्क में पानी आया था। यह खोज मंगल के पुराने वातावरण को समझने में मदद कर सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, उस समय मंगल आज की तरह ठंडा और सूखा नहीं था।
इंसानी खोज का सबसे बड़ा केंद्र 

बता दें कि मंगल ग्रह हमेशा इंसानी खोज का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के कई रोवर्स और आॅर्बिटर्स ने मंगल ग्रह पर पर पानी होने के पुख्ता सबूत जुटाए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर पृथ्वी की तरह ही विशाल नदियां, झीलें और महासागर हुआ करते थे। आज की तारीख में मंगल की सतह पर सूखी हुई नदियों के रास्ते और डेल्टा साफ देखे जा सकते हैं। वर्तमान में मंगल ग्रह के ध्रुवों पर बड़े पैमाने पर पानी बर्फ के रूप में जमा हुआ है। इसके अलावा, वैज्ञानिकों को मंगल ग्रह की सतह के नीचे भी विशाल बफीर्ली परतें मिली हैं, जो भविष्य में इंसानी मिशनों के लिए बहुत काम आ सकती हैं। सहारा के रेगिस्तान में मिली चट्टान को तेघाजा 001 नाम दिया गया है। यह माली के तेघाजा नमक मैदान में मिली थी। शुरूआत में वैज्ञानिकों को यह पता नहीं था कि यह पत्थर कहां से आया है।  इसकी पहचान करने के लिए वैज्ञानिकों ने इसमें मौजूद आॅक्सीजन के आइसोटोप की जांच की। बता दें कि आइसोटोप एक ही तत्व के अलग-अलग रूप होते हैं। अलग-अलग ग्रहों की चट्टानों में इनका अनुपात अलग हो सकता है। जांच में इस पत्थर के आइसोटोप मंगल की चट्टानों से मेल खाते मिले। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इसकी बनावट और खनिजों की जांच की। इसमें जिरकॉन नाम के छोटे क्रिस्टल मिले। इन क्रिस्टल की मदद से वैज्ञानिकों ने चट्टान की उम्र का पता लगाया। चट्टान में मिले खनिज और उनकी बनावट बताते हैं कि मंगल पर कभी पानी मौजूद था। पानी के संपर्क में आने से चट्टान के कुछ खनिजों में बदलाव हुआ था।
मंगल पर पानी की खोज


यह जानकारी इसलिए अहम है, क्योंकि इससे यह जानने में भी मदद मिल सकती है कि समय के साथ मंगल पर पानी कैसे कम हुआ। वैज्ञानिकों ने मंगल की परिक्रमा कर रहे आॅर्बिटर से मिले आंकड़ों की तुलना इस चट्टान के खनिजों और रासायनिक संरचना से की। इसके आधार पर मंगल पर 13 ऐसी जगहों की पहचान हुई, जहां से यह चट्टान आ सकती है। इनमें से कई जगहें मंगल के दक्षिणी हिस्से में मौजूद ऊंचे और गड्ढों वाले इलाके में हैं। हालांकि, इसकी सही जगह की पहचान अभी नहीं हो पाई है। वैज्ञानिकों के अनुसार मंगल की सतह पर किसी बड़े अंतरिक्षीय पिंड के टकराने से वहां की चट्टान का एक टुकड़ा अंतरिक्ष में उछला होगा। लंबे सफर के बाद यह टुकड़ा धरती तक पहुंचा और सहारा रेगिस्तान में मिला। अंतरिक्ष से धरती पर गिरने वाले ऐसे ठोस पिंडों को उल्कापिंड कहते हैं। ये अक्सर रेगिस्तान और बफीर्ले इलाकों में मिलते हैं। यहां आसपास की जमीन के मुकाबले इन्हें पहचानना आसान होता है। तेघाजा 001 मंगल से धरती पर आए सबसे पुराने उल्कापिंडों में से एक है। इसमें मंगल की शुरूआती चट्टानों और उन पर पानी के असर के संकेत सुरक्षित हैं।