जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। वैज्ञानिकों ने एक ऐसे महाद्वीप की पहचान की है जो 8.5 करोड़ साल से खोया हुआ था। इसका अधिकांश हिस्सा पानी में डूबा हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका क्षेत्रफल भारत से लगभग दोगुना है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसके अध्ययन से यह पता चलगाया जा सकता है कि धरती का विनाश कैसे होता है। कैसे एक बड़ा भूभाग समुद्र में समा जाता है। धरती के अंत को लेकर कई तरह की वैज्ञानिक भविष्यवाणियां से सर्वे आते रहते हैं। कई बार इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग जैसी घटनाओं को अहम कारक बताया जाता है। वहीं कई वैज्ञानिक धरती से बड़े ऐस्टोरॉयड के टकराने से धरती से विनाश की बात करते हैं। इसके अलावा जल प्रलय की बात भी कही जाती है। इन सभी अनुमानों के बीच में अब वैज्ञानिकों ने एक नए महाद्वीप की खोज की है। बता दें कि एक आम नक्शे से लेकर स्कूलों की किताबों में हमें सात महाद्वीपों के बारे में पढ़ाया जाता है। शोधकर्ताओं ने जिस महाद्वीप की खोज की है उसे आठवां महाद्वीप कहा जा रहा है। यही लगभग पूरी तरह समुद्र के नीचे है। जियोलॉजिस्ट ने न्यूजीलैंड के आसपास पानी से घिरे इलाके का जियोलॉजिकल अध्ययन किया। इसमें दिलचस्प जानकारी सामने आई। इस जगह पर पानी के नीचे महाद्वीप के आकार का क्रस्ट यानी धरती की परत मिली है। यह आकार में भारत के लगभग दोगुने के बराबर है। भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि न्यूजीलैंड, न्यू कैलेडोनिया और चारों तरफ नीले पानी से घिरे कई छोटे-छोटे द्वीप दिखते हैं। असल में ये द्वीप टे रिउ-ए-माउदी या जीलैंडिया की दिखाई देने वाली चोटियां हैं। जीलैंडिया नाम का सुझाव जियोफिजिसिस्ट ब्रूस लुयेंडिक ने पहली बार दिया था। इस पर साल दर साल अध्ययन चलते रहे। अब निक मोर्टिमर और उनके साथियों ने इसके जियोलॉजिकल सबूत पेश किए हैं।
49 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल
जियोलॉजिकल अनुमान के अनुसार इस गायब महाद्वीप का क्षेत्रफल लगभग 49 लाख वर्ग किलोमीटर है। इसका 94 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के के नीचे है। वैज्ञानिकों का कहना है कि न्यूजीलैंड और न्यू कैलेडोनिया इसके पानी के ऊपर वाले सबसे बड़े हिस्से हैं। बता दें कि भूवैज्ञानिकों ने 2017 में पहली बार इसकी खोज की थी। जहाजों, सैटेलाइट्स और तटीय देशों को पहले से ही इन पहाड़ की कतारों और पठारों के बारे में पता चला। असल बात इनके वर्गीकरण की थी। उस समय भूवैज्ञानिकों ने बताया कि इन हिस्सों को पानी में डूबे अलग-अलग टुकड़ों के बजाय 49 लाख वर्ग किमी के एक महाद्वीप के तौर पर देखा जाए। आमतौर पर लोग समुद्र की तटरेखाओं को प्राकृतिक सीमा के रूप में समझते हैं, लेकिन जियोलॉजी के नजरिए से यह सही नहीं है। हर महाद्वीप का काफी हिस्सा समुद्र के नीचे होता है।
काफी घनी होती है समुद्री क्रस्ट
रिपोर्ट बताती है कि समुद्री क्रस्ट काफी घनी होती है और आम तौर पर लगभग 7 किलोमीटर मोटी होती है। जीलैंडिया में भूकंपीय माप के अध्ययन बताते हैं कि क्रस्ट आम तौर पर 10 से 30 किमी मोटी है। न्यूजीलैंड के साउथ आइलैंड के कुछ हिस्सों के नीचे तो यह 40 किलोमीटर से भी ज्यादा मोटी है। अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है कि जीलैंडिया हमेशा से डूबा नहीं था। 8.5 करोड़ साल पहले यह समुद्र से ऊपर हुआ करता है। शोध से पता चलता है कि 10 करोड़ से 8.5 साल पहले इसकी क्रस्ट आटे की तरह खिंच गई। महाद्वीपीय किनारा पतला हो गया। इसके बाद समुद्र तल के फैलने से तस्मान सागर बन गया। बाद की टेक्टोनिक यानी पृथ्वी के नीचे होने हलचल की घटनाओं ने अलग-अलग हिस्सों को मोड़ दिया था। बता दें कि यह अध्ययन उस बात की पुष्टि करता है कि जिसमें कहा गया था दुनिया के कई बड़े शहरों के ऊपर समुद्र में डूबने का खतरा मंडरा रहा है। समुद्र के बढ़ते जल स्तर की वजह से आने वाले दिनों में ये शहर डूब जाएंगे। इसके पीछे वैश्विक तापमान, पिघलते ग्लेशियर और जमीन के धंसने को प्रमुख कारण माना जा रहा है।रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक भूजल दोहन और भारी निर्माण कार्यों के कारण कई शहर अंदर ही अंदर धंस रहे हैं। समुद्र में डूबने वाले शहरों में जकार्ता, बैंकॉक, ढाका, शंघाई और मियामी जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। इसके अलावा भारत के भी कई तटीय इलाके प्रभावित हो रहे हैं। मुंबई, चेन्नई, कोच्चि, सूरत और विशाखापत्तनम जैसे शहर भी खतरे की सूची में हैं।





