डीआरडीओ ने तैयार किया लेजर सिस्टम, दुश्मन के ड्रोन के झुंड जलकर होंगे खाक

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। डीआरडीओ 30 किलोवाट क्षमता का ऐसा लेजर सिस्टम तैयार कर चुका है जो 5 किमी दूर से दुश्मन के ड्रोन को खाक कर देगा। यह तकनीक देश की रक्षा के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार यह सिस्टम ड्रोन, ड्रोन के झुंड और सर्विलांस सेंसर को निशाना बना सकता है। आधुनिक युद्ध में ड्रोन की अहमियत दुनिया ने देख ली है। अमेरिका, इजरायल और ईरान युद्ध के अलावा रूस और यूक्रेन युद्ध के दौरान ड्रोन से दुश्मन देशों को खूब नुकसान पहुंचाया गया। कम पैसे में बनने वाले ड्रोन विपक्षियों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। अब ड्रोन और ड्रोन के झुंड के हमलों से बचने के लिए भारत ने खास तकनीक विकसित कर ली है। यह तकनीक जल्द ही देश की सीमाओं और जरूरी जगहों पर तैनात की जाएगी। डीआरडीओ ने जिस खास तकनीक का निर्माण किया है वह 30 किलोवाट क्षमता वाले काउंटर-ड्रोन लेजर हथियार है। इसे मानवरहित हवाई वाहनों यानी ड्रोन से बढ़ते खतरे से बचने की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 
ट्रक पर लगाया जाने वाला सिस्टम 

बता दें कि यह ट्रक पर लगाया जाने वाला लेजर सिस्टम है। यह करीब 5 किलोमीटर तक की दूरी पर मौजूद दुश्मन के ड्रोन स्वार्म यानी ड्रोन के झुंड को निशाना बना सकता है। इसके अलावा फिक्स्ड-विंग यूएवी और निगरानी के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सर्विलांस सेंसर भी इसकी जद में आ सकते हैं। यानी आसमान में एक साथ कई छोटे ड्रोन भारतीय सीमाओं की तरफ बढ़ें, तो यह सिस्टम उन्हें रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है।  बता दें कि काउंटर-ड्रोन लेजर हथियार दुनियाभर में आधुनिक सैन्य तकनीक का एक हिस्सा बनने जा रहे हैं। कई देश इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इजराइल का काउंटर-ड्रोन लेजर हथियार ड्रोन और रॉकेट हमलों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। इसी तरह अमेरिकी वायुसेना ने हाल ही में यूरोपीय ठिकानों की सुरक्षा के लिए काउंटर-ड्रोन लेजर हथियार तैनात किए हैं। चीन भी पीछे नहीं है। काउंटर-ड्रोन लेजर हथियारों को डायरेक्टेड एनर्जी वेपन भी कहा जाता है। ये हथियार पारंपरिक गोला-बारूद या मिसाइलों के बजाय अत्यधिक केंद्रित प्रकाश पुंज का उपयोग करके दुश्मन के ड्रोन को हवा में ही जलाकर या उसके सेंसर को नष्ट करके मार गिराते हैं। डीआरडीओ द्वारा निर्मित ड्रोन भी इसी तकनीक पर काम करता है। डीआरडीओ द्वारा निर्मित हथियार की सबसे खास बात इसका हमला करने का तरीका है। पारंपरिक मिसाइल को लक्ष्य तक पहुंचने में कुछ समय लगता है, लेकिन लेजर बीम प्रकाश की गति से लक्ष्य की तरफ जाती है। ऐसे में निशाना बनने वाले ड्रोन को प्रतिक्रिया देने या रास्ता बदलकर बच निकलने का बेहद कम मौका मिलता है। 
तकनीक की जरूरत 

इस तकनीक की जरूरत को हालिया संघर्षों के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। आॅपरेशन सिंदूर और कुछ हालिया संघर्षों में सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल भारतीय हवाई रक्षा ठिकानों की निगरानी और उनकी स्थिति का पता लगाने के लिए किए जाने की बात सामने आई थइी। ऐसे में कम कीमत वाले ड्रोन को नष्ट करने के लिए करोड़ों रुपये की महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं हो सकता। यही वजह है कि इस काउंटर-ड्रोन लेजर सिस्टम की अहमियत बढ़ जाती है। एक तरफ यह तेजी से लक्ष्य पर हमला कर सकता है, वहीं दूसरी तरफ ड्रोन के खिलाफ हर बार महंगी मिसाइल खर्च करने की जरूरत को कम करने की क्षमता रखता है। डीआरडीओ के इस स्वदेशी 30 किलोवाट लेजर हथियार के विकास और निर्माण का काम पूरा होने के बाद अब अगले चरण में इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन की तैयारी है। यदि तय योजना के मुताबिक काम आगे बढ़ता है तो अगले छह महीने के भीतर इसके उत्पादन की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारतीय रक्षा बलों के पास ड्रोन खतरों से निपटने के लिए एक और स्वदेशी विकल्प उपलब्ध हो सकेगा।