जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। देश को पहली हाइड्रोजन ट्रेन मिलने वाली है। पीएम मोदी कल यानी 17 जुलाई को इसे हरी झंडी दिखाएंगे। यह ट्रेन बिना धुआं छोड़े ही हाइड्रोजन फ्यूल से चलेगी जिसे रेलवे के ग्रीन ट्रांसपोर्ट मिशन में बड़ा कदम माना जा रहा है। इसे चतला-फिरता बिजली घर भी कहा जा रहा है। इसके अलावा महज 5 रुपये में कई किलोमीटर की यात्रा की जा सकेगी।
रेलवे ने विकास के देखे कई पड़ाव
रेलवे ने अपने विकास के कई पड़ाव देखे हैं। भाप वाले इंजन से यात्रा और परिवहन के क्षेत्र में शुरूआत करने वाला रेलवे अब हाईटेक हो चुका है। भाप वाले इंजनों की जगह डीजन इंजन आए तो रेलवे के विकास में और गति आई। जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया परिवर्तन के साथ धीरे-धीरे डीजल इंजनों को भी हटाया जाने लगा। इसके बाद इलेक्ट्रिक इंजन का दौर आ गया। आने वाले 20 से 30 सालों में ऐसा माना जा रहा है कि इलेक्ट्रिक इंजन की भी छुट्टी हो सकती है। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भारतीय रेलवे के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। देश की पहली ग्रीन हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन लांच होने के लिए तैयार है। 17 जुलाई को हरियाणा के जींद से पीएम मोदी इस ऐतिहासिक ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इसे स्वच्छ, हरित और शून्य-उत्सर्जन यानी जीरो एमिशन परिवहन की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर हाइड्रोजन ट्रेन की तस्वीरें पोस्ट करते हुए लिखा कि भारत की पहली हाइड्रोजन-पावर्ड ट्रेन हरियाणा से शुरू होने जा रही है।
परियोजना को लेकर उत्साह
पीएम मोदी की इस पोस्ट के बाद इस परियोजना को लेकर लोगों में उत्साह बढ़ गया है। यह परियोजना भारतीय रेलवे की हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज पहल का हिस्सा है। इस योजना के तहत रेलवे भविष्य में 35 और हाइड्रोजन ट्रेनों को शुरू करने की तैयारी कर रहा है, ताकि विरासत (हेरिटेज) और ग्रामीण मार्गों पर चल रहे पुराने डीजल इंजनों की जगह पर्यावरण-अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराया जा सके। यह ट्रेन भारतीय रेलवे को दुनिया के गिने-चुने देशों की कतार में खड़ा कर देगी, जहां हाइड्रोजन ट्रेनें संचालित होती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय रेलवे ने उन रूटों के लिए इस तकनीक का परीक्षण किया है जहां बिजली के तार बिछाना बहुत मुश्किल और महंगा साबित होता है। नई ट्रेन को 10 कोच वाले हाइड्रोजन-चालित डीईएमयू सेट के रूप में तैयार किया गया है। इसमें 682 सीटें हैं, जबकि कुल 2,600 यात्रियों को ले जाने की क्षमता है। परीक्षण के दौरान ट्रेन ने अधिक गति हासिल की थी, लेकिन नियमित संचालन के लिए इसकी अधिकतम गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा तय की गई है। यह अभी एक पायलट परियोजना है, इसलिए इसे नियंत्रित और सावधानीपूर्वक तरीके से शुरू किया जा रहा है।
बाहरी वातावरण से मिलने वाली आक्सीजन
मीडिया रिपोर्टस के अनुसार, हाइड्रोजन ट्रेनें चलते-फिरते बिजलीघर की तरह काम करती हैं। इनमें मौजूद हाइड्रोजन गैस और बाहरी वातावरण से मिलने वाली आॅक्सीजन को फ्यूल सेल के भीतर मिलाया जाता है। इस रासायनिक प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है, जो ट्रेन के इलेक्ट्रिक मोटरों को चलाती है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का हानिकारक धुआं नहीं निकलता। इसके बजाय केवल जलवाष्प यानी वॉटर वेपर और गर्मी उत्पन्न होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन ट्रेनों का उद्देश्य रेलवे नेटवर्क को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त बनाना है। खासकर उन मार्गों पर जहां ओवरहेड बिजली लाइनें बिछाना कठिन या बेहद महंगा है। हाइड्रोजन ट्रेनें बिना बड़े बुनियादी ढांचे के इलेक्ट्रिक ट्रेनों जैसे पर्यावरणीय लाभ प्रदान करती हैं और इन्हें डीजल ट्रेनों की तरह कुछ ही मिनटों में दोबारा ईंधन भरकर चलाया जा सकता है।





