डीआरडीओ ने लांच की स्वदेशी तकनीक, 21 किमी की ऊंचाई से दुश्मनों पर रखेगी नजर

जनप्रवाद  ब्यूरो, नोएडा। डीआरडीओ ने एक 21 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्वदेशी प्लेटफॉर्म को लांच कर रक्षा क्षेत्र में नया इतिहास रचा है। भारत की यह तीसरी आंख आसमान से दुश्मन पर नजर रखेगी। इसके अलावा यह सेना अन्य कार्यो में भी सहायता करेगी। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता के लिए बधाई दी है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने स्वदेशी रूप से विकसित उच्च ऊंचाई प्लेटफॉर्म प्रणाली यानी हाई एल्टीट्यूड एयरशिप का सफल उड़ान परीक्षण किया। इस परीक्षण के दौरान प्रणाली ने 21 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल की और समताप मंडल में लंबे समय तक उड़ान भरने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया। बता दें कि इस उपलब्धि को आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत भारत की निगरानी और एयरोस्पेस क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जमीन से करीब 21 किलोमीटर ऊपर जहां हवा बेहद विरल हो जाती है वहां आम विमान भी नहीं पहुंच पाते, उस ऊंचाई पर भारत ने इस नई तकनीकी क्षमता का सफल प्रदर्शन किया है। परीक्षण के दौरान यह प्लेटफॉर्म समुद्र तल से 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा। इसके बाद इसे करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर 30 मिनट से ज्यादा समय तक सफलतापूर्वक बनाए रखा गया। तय परीक्षण पूरा होने के बाद इसे नियंत्रित तरीके से नीचे लाया गया और सुरक्षित रूप से जमीन पर वापस उतारा गया।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी बधाई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता पर डीआरडीओ, भारतीय वायुसेना, रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों और उद्योग जगत की टीमों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सफल परीक्षण लंबे समय तक समताप मंडल में रहने वाले वायुयान को विकसित करने की दिशा में आत्मनिर्भर भारत की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस पूरी उड़ान पर जमीन से लगातार नजर रखी गई। प्लेटफॉर्म से वास्तविक समय में वीडियो और उड़ान से जुड़े दूसरे आंकड़े नियंत्रण केंद्र तक पहुंचते रहे। इन आंकड़ों ने पुष्टि की कि प्लेटफॉर्म ने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन किया। इसमें उड़ान को नियंत्रित करने और निगरानी रखने के लिए कई अहम उपकरण लगाए गए थे। इनमें जड़त्वीय मापन इकाई, वैश्विक स्थिति निर्धारण प्रणाली का ग्राही, कैमरे और ऊंचाई नियंत्रित करने वाली व्यवस्था शामिल थी।
समताप मंडल में लंबे समय तक रहकर निगरानी 


बता दें कि इस प्लेटफॉर्म की खासियत सिर्फ इसकी ऊंचाई नहीं है। इसे इस तरह विकसित किया जा रहा है कि यह समताप मंडल में लंबे समय तक रहकर निगरानी जैसे काम कर सके। यह एयर सिस्टम से हल्की प्रणाली है और भविष्य में लंबे समय तक एक ही क्षेत्र पर नजर रखने वाली हवाई व्यवस्था के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसका विकास आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट ने किया है। परीक्षण को सफल बनाने के लिए भारतीय वायुसेना के साथ विमान प्रमाणन, नागर विमानन, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और अन्य नागरिक एजेंसियों ने भी सहयोग किया। रक्षा सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने परीक्षण की जानकारी साझा की। उनके अनुसार एयर सिस्टम से हल्का, यह लंबे समय तक ऊंचाई पर रहने में सक्षम वायुयान तंत्र है। इसे समताप मंडल में लंबे समय तक रहकर निगरानी जैसे कार्यों के लिए विकसित किया जा रहा है। इसकी खासियत यह है कि यह पारंपरिक विमान की तरह लगातार उड़ान भरने के बजाय बहुत अधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक तैनात रह सकता है। यह पूरी तरह से सौर ऊर्जा से चलने वाला मानवरहित विमान है। दिन में सूरज की रोशनी से चार्ज होने वाली लीथियम-सल्फर बैटरियों के दम पर यह बिना नीचे उतरे लगातार 3 से 4 महीने तक हवा में रह सकता है। उपग्रह पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए किसी एक जगह से आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन एचएपीएस किसी एक रणनीतिक सीमा के ठीक ऊपर हफ्तों तक स्थिर रहकर रियल-टाइम लाइव फीड प्रदान कर सकता है।  उपग्रहों को लॉन्च करने में सैकड़ों करोड़ का खर्च आता है, जबकि एचएपीएश को लॉन्च करना और रखरखाव बेहद सस्ता है। तकनीक बदलने पर इसे आसानी से नीचे उतारकर सेंसर अपग्रेड किए जा सकते हैं।