जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। देशभर की नदियों को लेकर चल रहे रिसर्च में दो बड़े खुलासे हुए हैं। रिसर्च के अनुसार 200 वर्षों में दिल्ली की यमुना 70 प्रतिशत से ज्यादा सिमट गई है। वहीं इस खोज में कानपुर-प्रयागराज के बीच 200 किमी लंबी भूमिगत प्राचीन नदी का पता चला है। यह नदी यूपी के लिए नया जलाशय का केंद्र बन सकती है।
दिल्ली से होकर बहने वाली यमुना नदी
दिल्ली से होकर बहने वाली यमुना नदी पिछले 200 सालों में अपने मूल स्वरूप का बड़ा हिस्सा खो चुकी है। दिल्ली विश्वविद्यालय और भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, भोपाल के शोधकर्ताओं द्वारा की गई रिसर्च में पता चला है कि यमुना की औसत चौड़ाई लगभग 70 प्रतिशत घट गई है। वहीं इसके डिस्चार्ज में 89 प्रतिशत की कमी आई है। जर्नल आॅफ जियोलॉजिकल सोसाइटी आॅफ इंडिया में प्रकाशित इस रिसर्च में दिल्ली के 50 किलोमीटर लंबे यमुना क्षेत्र में पिछले दो शताब्दियों के बदलावों का विश्लेषण किया गया। इसके लिए शोधकर्ताओं ने 1799 के ऐतिहासिक नक्शों, पुराने टोपोग्राफिक सर्वे, सैटेलाइट इमेज और नदी की चौड़ाई के आंकड़ों का उपयोग किया। रिसर्च के अनुसार, साल 1799 में यमुना की औसत चौड़ाई लगभग 658 मीटर थी, जो अब घटकर करीब 210 मीटर रह गई है। इसी दौरान नदी का अनुमानित जल प्रवाह करीब 30,000 घन मीटर प्रति सेकंड से घटकर लगभग 3,900 घन मीटर प्रति सेकंड रह गया। 200 सालों यमुना में हुए इस परिर्वतन के पीछे का करण बैराज, नहरें और शहरीकरण को बताया गया है।
नए अध्ययन में अच्छी खबर आई समाने
दूसरी ओर नए अध्ययन में अच्छी खबर भी समाने आई है। शोध के अनुसार कानपुर से प्रयागराज के बीच 200 किलोमीटर लंबी प्राचीन नदी मिली है। यह नदी मार्ग यानी पैलियो चैनल जमीन से 25 मीटर नीचे है। भूगर्भ जल विभाग के अनुसार वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी सीएसआईआर के राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद ने गंगा-यमुना दोआब के नीचे मौजूद जलभृतों और प्राचीन नदी प्रणालियों का अध्ययन किया है। इसके लिए हवाई भू-भौतिकीय सर्वेक्षण और बोरहोल लॉगिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन में प्रयागराज से कानपुर के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबी पैलियोचैनल प्रणाली की पहचान हुई। आसान भाषा में समझें तो ये जमीन के नीचे मौजूद पुराने नदी मार्ग हैं।
वर्षा जल के भूजल भंडार
अब सरकार इस नदी मार्ग का उपयोग वर्षा जल के भूजल भंडार में पुनर्भरण के लिए करेगी। भूगर्भ जल विभाग राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन यानी नमामि गंगे के सहयोग से इस परियोजना को आगे बढ़ाएगा। राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान यानी एनजीआरआई तकनीकी सहयोग देगा। परियोजना तीन वर्ष में पूरी की जाएगी। भूगर्भ जल विभाग के निदेशक डा. राजेश कुमार प्रजापति का कहना है कि परियोजना के लिए पहला सर्वे 2022 में कराया गया था। अब इसके आधार पर आगे की कार्रवाई शुरू की गई है। परियोजना का उद्देश्य बारिश के पानी को बहकर बर्बाद होने से रोकना है। इसके लिए पानी को जमीन के नीचे मौजूद जलभृतों तक पहुंचाया जाएगा। जलभृत जमीन के नीचे पानी जमा रखने वाली प्राकृतिक परतें होती हैं। कुओं और नलकूपों में मिलने वाला भूजल इन्हीं जलभृतों से आता है। वैज्ञानिक अध्ययन के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि बारिश का पानी जमीन के अंदर किस जगह और किस रास्ते से तेजी से पहुंच सकता है। इसी आधार पर भूजल पुनर्भरण के लिए उपयुक्त जगहों का चयन किया जाएगा।
पहले चरण में छह स्थानों को चुना
पहले चरण में छह स्थानों को चुना गया है। यहां पायलट अध्ययन के साथ भूजल पुनर्भरण की संरचनाएं बनाई जाएंगी। इनसे बारिश के पानी को जमीन के अंदर पहुंचाया जाएगा। इसके बाद लगातार निगरानी की जाएगी कि इन संरचनाओं से भूजल स्तर और जलभृतों पर कितना असर पड़ रहा है। पायलट प्रोजेक्ट में अलग-अलग जगहों पर यह देखा जाएगा कि कौन-सी पुनर्भरण व्यवस्था ज्यादा प्रभावी है। यह भी जांचा जाएगा कि स्थानीय जलभृत बारिश के पानी को कितनी मात्रा में ग्रहण कर रहे हैं। पायलट चरण से मिले परिणामों के आधार पर परियोजना को गंगा-यमुना दोआब के दूसरे उपयुक्त स्थानों तक बढ़ाया जाएगा। यानी पहले छह जगहों पर प्रयोग होगा, फिर उसके नतीजों के आधार पर बड़े क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण की योजना बनाई जा सकती है। परियोजना के दौरान नदी, बारिश के पानी, भूजल और इन पुराने नदी मार्गों के बीच संबंध को और बेहतर तरीके से समझा जाएगा।





