जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। इसरो के चंद्रयान-3 ने चन्द्रमा को लेकर एक बड़ा खुलासा किया है। इस राज के बाहर आते ही विज्ञान जगत में नई बहस छिड़ गई है। चंद्रयान-3 मिशन के प्रयोग से पता चला है कि चांद की सतह एक समान धूल का ढेर नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग परतों वाली केक जैसी संरचना है। ऊपरी परत सिर्फ कुछ सेंटीमीटर मोटी है, जबकि उसके नीचे की परत ज्यादा सख्त और घनी है।
चंद्रयान-3 ने किया खुलासा
भारत के चंद्रयान-3 ने एक बार फिर दुनिया को चौंका दिया है। अब तक हम चांद को एक शांत और बेजान जगह मानते थे, लेकिन इसरो की नई रिपोर्ट ने इस धारणा को बदल दिया है। विक्रम लैंडर ने पुष्टि की है कि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव जिंदा है। वहां सतह के ठीक ऊपर एक इलेक्ट्रिकली एक्टिव वातावरण मौजूद है। विक्रम लैंडर पर लगे रंभा-एलपी पेलोड ने जो डेटा भेजा है, उसने वैज्ञानिकों के बीच नई बहस छेड़ दी है। बता दें कि यह खोज चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर के हॉप यानी छोटी छलांग के दौरान हुई।
विज्ञान जगत में नई बहस
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने कहा कि चंद्रयान-3 मिशन के प्रयोग से पता चला है कि चांद की सतह एक समान धूल का ढेर नहीं है। यह दो अलग-अलग परतों वाली केक जैसी संरचना है। ऊपरी परत सिर्फ कुछ सेंटीमीटर मोटी है, जबकि उसके नीचे की परत ज्यादा सख्त और घनी है। फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-3 के डेटा जांच में पाया कि चांद की सतह पर लगातार छोटे-छोटे उल्कापिंडों के टकराने से ऊपरी परत बारीक और ढीली हो गई है। इसरो ने इसे आसान भाषा में समझाते हुए कहा कि अगर कोई अंतरिक्ष यात्री चांद पर चलेगा तो ऊपरी सतह सूखे आटे जैसी लगेगी। वहीं कुछ सेंटीमीटर नीचे यह नम और सख्त मिट्टी जैसा महसूस होगा।
शोध को बड़ी उपलब्धि बताया
वैज्ञानिकों ने इस शोध को बड़ी उपलब्धि बताया। उनके अनुसार चंद्रमा की सतह की दो-परत वाली संरचना को समझना भविष्य के चंद्र मिशनों के लिए के काम आएगी। चांद की सतह की दो-परत वाली संरचना की खोज से न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के चंद्र मिशनों को लाभ मिलेगा। इसरो के अनुसार, यह जानकारी खासकर चांद के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में लैंडिंग, रोवर चलाने और भविष्य में वैज्ञानिक बेस बनाने के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। यह अध्ययन चांद की सतह की विविधता को समझने में पहला महत्वपूर्ण कदम है। इससे वैज्ञानिकों को यह भी पता चलेगा कि चांद पर निर्माण कार्य कैसे किए जाएं, वहां उपकरण कैसे लगाएं और भविष्य में मानव बस्ती बसाने की योजना कैसे बनेगी। वैज्ञानिकों के अनुसार चांद की सतह सदियों से छोटे उल्कापिंडों के निरंतर हमलों से प्रभावित रही है। यही कारण है कि ऊपरी परत इतनी ढीली और बारीक हो गई है। वहीं नीचे की परत अपेक्षाकृत सुरक्षित रही है। यह अध्ययन अपनी तरह का पहला अनोखा है। यह खोज भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों में एक नया अध्याय जोड़ेगी।
पहले भी दे चुका है डेटा
बता दें कि इससे पहले भी 2 दिसंबर 2023 में चन्द्रयान ने महत्वपूर्ण डेटा भेजा था। इस डेटा के अनुसार कई हैरान करने वाली सामने आई थी। डेटा के अनुसार यहां के इलेक्ट्रॉनों का काइनेटिक टेम्परेचर 3,000 से 8,000 केल्विन के बीच मापा गया था। इसका मतलब है कि चांद की सतह के ठीक ऊपर का वातावरण शांत नहीं है, बल्कि वहां जबरदस्त ऊर्जा और हलचल मौजूद है। इसरो की स्टडी में एक और दिलचस्प बात सामने आई थी। जिसमें पता चला कि चांद पर प्लाज्मा का यह वातावरण बदलता रहता है। दिन में जब चांद सूरज के सामने होता है, तो वहां का प्लाज्मा पूरी तरह से सोलर विंड के प्रभाव में रहता है। वहीं जब चांद घूमते हुए पृथ्वी की मैग्नेटोटेल यानी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के पिछले हिस्सा से गुजरता है, तो वहां का वातावरण बदल जाता है। तब वहां सूरज के कण नहीं, बल्कि पृथ्वी से निकलने वाले कण हावी हो जाते हैं।





