वैज्ञानिकों ने सुलझाया विशाल ब्लैक होल से जुड़ा सदियों पुराना रहस्य

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। वैज्ञानिकों ने 50 साल बाद आकाशगंगा के केंद्र में स्थित विशाल ब्लैक होल से जुड़ा एक पुराना रहस्य सुलझाने का दावा किया है। खगोलविद यहां विशेष प्रकार की गैसीय हवा से बने जेट यानी ब्लैक होल की गति की तलाश कर रहे थे। अब इसक प्रमाण मिल गए हैं कि ब्लैक होल के घूमने की गति कितनी तेज होती है। इस खोज से ब्लैक होल के व्यवहार को समझने में नई मदद मिलेगी।
उच्च-रिजॉल्यूशन रेडियो अध्ययन 


वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा या मिल्की से निकटवर्ती आकाशगंगाओं पर किए गए एक उच्च-रिजॉल्यूशन रेडियो अध्ययन में बड़ी सफलता हासिल की है। उन्होंने ऐसे सक्रिय सुपरमैसिव ब्लैक होलों का पता लगाया है जो अब तक वैज्ञानिकों की नजरों से ओझल था। वैज्ञानिकों के अनुसार, लगभग हर बड़ी आकाशगंगा के केंद्र में एक विशाल ब्लैक होल मौजूद होता है। इनमें से कई इतने कम सक्रिय होते हैं कि पारंपरिक दूरबीनों और सर्वेक्षणों से उनका पता लगाना संभव नहीं हो पाता। इसके बावजूद ये ब्लैक होल जेट और गैसीय बहिर्वाह के माध्यम से अपने आसपास के वातावरण को प्रभावित करते हैं, जिससे तारों के निर्माण और आकाशगंगाओं के दीर्घकालिक विकास पर असर पड़ता है। इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पहली बार ब्लैक होल से निकलने वाले जेट की तात्कालिक अविश्वसनीय शक्ति को मांपने में सफलता हासिल की है। अंतरराष्ट्रीय शोध दल के अनुसार इस ब्लैक प्रणाली से निकलने वाले जेट की शक्ति 10,000 सूर्यों के बराबर है। वहीं उसकी गति लगभग 355 मिलियन मील प्रति घंटा यानी 540 मिलियन किलोमीटर प्रति घंटा है। बता दें कि यह गति प्रकाश की गति की आधी है।
7,200 प्रकाश वर्ष दूर स्थित ,

खोजकर्ताओं के अनुसार यह सुपरमैसिव ब्लैक होल 7,200 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है। सबसे बड़ी बात यह है कि सिग्नस एक्स-1 में स्थित इस ब्लैक होल के पास नीला सुपरजायंट तारा भी है। यह इसका निरंतर साथी बना हुआ है। 50 सालों के लगातार अध्ययन के बाद इसकी पहचान हो सकी है। आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के स्टीव प्रबु और उनकी टीम ने वैश्विक दूरबीन नेटवर्क द्वारा प्राप्त 18 वर्षों की उच्च-रिजोल्यूशन रेडियो इमेजिंग के आधार पर इसकी खोज की है। इस अध्ययन को नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित किया गया है।  प्रबु के अनुसार 1960 के दशक में इस बाइनरी सिस्टम की खोज शुरू हुई थी। इस अब जाकर पूरा किया जा सका है।
सैजिटेरियस ए दिया गया नाम 

खोजे गए इस ब्लैकहोल को सैजिटेरियस ए नाम दिया गया है। इसका द्रव्यमान सूर्य से लगभग 40 लाख गुना अधिक है। वैज्ञानिक लंबे समय से मानते थे कि यह ब्लैक होल अपने आसपास की गैस को निगलने के साथ-साथ कुछ पदार्थ को बाहर भी फेंकता होगा। सैद्धांतिक मॉडल बताते हैं कि जब गैस ब्लैक होल की ओर तेजी से गिरती है, तब उसका कुछ हिस्सा गर्म होकर बाहर निकल सकता है। इसी प्रक्रिया से हवा या जेट जैसी संरचनाएं बनती हैं। बता दें कि ब्लैक होल स्पेस में एक ऐसी जगह है, जहां गुरुत्वाकर्षण इतना तेज होता है कि वहां से कुछ भी बाहर नहीं निकल सकता है। वहीं इसके घूमने की गति की बात करें तो ब्लैक होल जेट बहुत तेज, पतली धाराएं होती हैं। ये ब्लैक होल के ध्रुवों से निकलती हैं। ये लगभग प्रकाश की गति से ट्रैवल करती हैं। ब्लैक होल के चारों तरफ गैस और धूल की एक घूमती हुई डिस्क बनती है, जिसे एक्रीशन डिस्क कहते हैं। जेट तभी बनते हैं जब ब्लैक होल तेजी से मैटर खा रहा हो और तेज घूम रहा हो। साधरण शब्दों में समझें तो पता चलता है कि ब्लैक होल सब कुछ खाता नहीं है। जो हजम नहीं होता उसे वो सुपरफास्ट जेट के रूप में उगल देता है। इससे अंतरिक्ष में तारों का कचरा जमा हो जाता है। इससे नए तारों का निर्माण होता है। संयुक्त विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि ब्लैकहोल के तेज गति के साथ उत्सर्जन से तारा निर्माण, सुपरनोवा या एक्स-रे बाइनरी जैसी प्रणालियों का जन्म होता है।