जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। नीट पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर हुआ युवा आंदोलन भारत ही नहीं पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना। इस आंदोलन के जरिए पेपर लीक को लेकर सरकार की जवाब देही तय करने की मांग की गई। इस पर प्रधानमंत्री ने आगे आकर युवाओं से संवाद कर इस बात का यकीन दिलाने की भरसक कोशिश की कि सरकार इस मसले पर गंभीर है। दूसरी ओर इस आंदोलन में ऐसी गंभीर बातें भी हुर्इंजिस विषय पर आज हम चर्चा करेंगे। आंदोलन के जरिए कुछ अराजक तत्वों के उत्पात और पुलिस की लाठीचार्ज पर भी चर्चा करेंगे। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा यह भी आपको बताएंगे। जून महीने से शुरू हुआ जेन-जी आंदोलन भारत की राजनीति में चर्चा का मुख्य विषय बना रहा। परीक्षा की पारदर्शिता से लेकर सरकारी नौकरियों में भर्ती तक, व्यवस्थागत जवाबदेही की मांग करने वाली युवा आवाजें समाचारों की सुर्खियों में रहीं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि परीक्षाओं को पाददर्शिता के साथ संपन्न कराने की जिम्मेदारी सरकार की होती है। जब कोई भी सरकार इस जिम्मेदारी को पूरा करने में नाकाम होती है तो युवाओं में आक्रोश फैलता है। ऐसे में छात्रों का आक्रोश लाजमी है। केंद्र से लेकर कई राज्यों में पेपर लीक की घटनाएं हुईं। ऐसे में सीजेपी की छोटी सी मुहिम ने विशाल रूप ले लिया। युवाओं को लगने लगा कि परीक्षाओं में धांधली रोकने के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। देखा जाए तो जब भी कोई प्रशासनिक चूक होती है चाहे वह प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में देरी हो या संस्थागत कमियां। सत्ता में बैठी सरकार का यह कर्तव्य है कि वह जनता की शिकायतों का तुरंत समाधान करे और असंतोष बढ़ने से पहले जनता का विश्वास बहाल करे।
वहीं सरकार ने भी युवाओं के इस आंदोलन को अच्छी तरह से समझा तभी तो पीएम मोदी ने स्वयं आगे आकर सोशल मीडिया के जरिए युवाओं से संवाद कायम किया। उन्होंने छात्रों को भरोसा दिलाने के लिए कई बार अपने वीडियो जारी किए। साथ ही सरकार ने एनटीए से लेकर शिक्षा मंत्रालय के कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की। पीएम मोदी ने स्वयं आगे आकर देश के युवाओं से सीधा संवाद किया और उनकी प्रशासनिक मांगों को स्वीकार किया। राजनीतिक विरोधियों ने तुरंत इसे सरकार की लाचारी या डर के रूप में पेश करने की कोशिश की। लेकिन, यह सोच सच्चे नेतृत्व और राजधर्म को न समझ पाने का नतीजा है। प्रधानमंत्री किसी डर या दबाव के कारण आगे नहीं आए, बल्कि वे संवेदनशीलता और नैतिक कर्तव्य के भाव से सामने आए। आंदोलन के दौरान जब यह स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक तत्वों और भड़काऊ माहौल के कारण मासूम छात्र जो देश का भविष्य हैं, हिंसा और अव्यवस्था का शिकार हो गए तो सरकार ने उनकी रक्षा को सर्वोपरि माना। प्रधानमंत्री का सीधा हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि एक जिम्मेदार नेता राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर युवाओं के कल्याण को प्राथमिकता देता है। जायज मांगों को स्वीकार करना, त्वरित सुधार तंत्र स्थापित करना और यह सुनिश्चित करना कि किसी भी छात्र का भविष्य या आत्मसम्मान प्रभावित न हो, यह एक संवेदनशील और परिपक्व नेतृत्व का प्रतीक है, न कि किसी कमजोरी का।
दूसरी ओर इन प्रदर्शनों का गहराई से विश्लेषण करें तो कई जटिल और चिंताजनक सच्चाई सामने आती है। देखा जाए तो यह आंदोलन छात्रों की जायज चिंताओं से शुरू हुआ, लेकिन पर्दे के पीछे के राजनीतिक खेल ने कई चिंताओं को जन्म दे दिया। इसमें मुख्य रूप से आशंका इस बात की है कि इस आंदोलन के पीछे बड़े राजनीतिक हित के साथ ही विदेशी ताकतें हो सकती हैं जिसने अपने स्वार्थ के लिए इस आंदोलन को मोहरा बनाने की कोशिश की। इस बारे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लोकतांत्रिक राजनीति का पुराना तरीका है कि जनता के असंतोष को पहचानो, उसे एक आधुनिक सांस्कृतिक रूप दो और अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए हथियार बना लो। आम छात्र जहां केवल पारदर्शी परीक्षाओं और निष्पक्ष अवसरों की चिंता करते हैं, वहीं उनके पीछे लामबंद होने वाले राजनीतिक दलों के हित पूरी तरह से अलग होते हैं। प्रशासनिक सुधारों की दिशा में काम करने के बजाय, विपक्षी दल अक्सर छात्रों की ऊर्जा का इस्तेमाल केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए करते हैं। हर प्रशासनिक विफलता को जेन जी विद्रोह का नाम देकर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की जाती है। जैसा कि कई राजनेताओं ने बार-बार यह बयान दिया कि जेन-जी को सड़कों पर उतरना चाहिए। उनके बयान इस बात की आशंका पैदा कर रहे हैं कि इस आंदोलन के पीछे कोई राजनीतिक ताकत हो सकती है। ऐसे में देखा जाए तो जब छात्रों के वास्तविक मुद्दों को राजनीतिक औजार बना दिया जाता है, तो समस्याओं के स्थायी समाधान की जगह केवल राजनीतिक बयानबाजी ही बची रह जाती है।
जहां तक विदेशी ताकतों की साजिश का सवाल है इन आशंकाओं का बल तब मिला जब इसमें कई अपराधिक तत्वों के शामिल होने की पुष्टि हुई। दिल्ली पुलिस के फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (एफआरएस) ने जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान 2873 आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की पहचान की है। हालांकि, जांच में सामने आया है कि मौजूदा समय में एफआरएस की चेहरे पहचानने की क्षमता करीब 15 से 20 प्रतिशत के बीच है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि सिस्टम ने प्रदर्शन में मौजूद अपराधी प्रवृत्ति के लोगों के केवल एक हिस्से की ही पहचान की है बाकी की पहचान होना बाकी है। यानी इस मामले की जांच अभी पूरी नहीं हुई। यह बातें इस आशंका की तस्दीक करती हैं कि पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश और नेपाल में हाल ही में हुए युवा आंदोलनों और भारत में हुए प्रदर्शनों के तरीकों में पाई जाने वाली समानताएं एक गंभीर भू-राजनीतिक सवाल खड़ा करती है। सवाल उठता है कि क्या इन आंदोलनों को विदेशी ताकतों द्वारा प्रभावित, प्रायोजित या वित्तपोषित किया गया था? फिलहाल इन सवालों के जवाब मिलना बाकी हैं। यह जांच का विषय भी है।
दुनिया भर में सरकारों के खिलाफ हुए जन आंदोलनों को समझा जाए तो एक बात साफ हो जाती है कि आज के दौर की हाइब्रिड वॉरफेयर में विरोधी देश उभरती हुई आर्थिक शक्तियों को अस्थिर करने के लिए उनके आंतरिक मतभेदों का फायदा उठाते हैं। पूरे दक्षिण एशिया में एक जैसा पैटर्न देखा गया। इसमें सोशल मीडिया अभियानों का रातों-रात फैलना, डिजिटल दुष्प्रचार और स्थानीय मुद्दों को सीधे तख्तापलट या सरकार विरोधी नारों में बदल देना शामिल है। जब भारत दुनिया के मंच पर मजबूती से आगे बढ़ रहा है, तो कई विदेशी ताकतों को भारत की आंतरिक अस्थिरता में ही अपना फायदा नजर आता है। ऐसे में विदेशी फंडिंग और भू-राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना को खारिज करना नासमझी होगी। राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में इन प्रदर्शनों के पीछे काम कर रहे विदेशी नेटवर्कों और डिजिटल अभियानों की गहन जांच अनिवार्य है। ये आशंकाएं इसलिए उठ रही हैं क्योंकि इस आंदोलन में बेहद घिनौनी और शर्मनाक बाते देखी गई। सोशल मीडिया पर जिस तरह पीएम मोदी को गालियां देते हुए वीडियो प्रसारित हुए वे कई सवाल खड़े करते हैं। यह बात सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया का सबसे लोकप्रिय नेता माना जाता है। ऐसे में उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने की भरसक कोशिश की गई। ये घटनाएं विदेशी ताकतों के शामिल होने की ओर इशारा करती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दुनिया के मंच पर भारत की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति में ऐतिहासिक बदलाव आया है। भारत और विदेशों में रहने वाले भारतीय आज दुनिया के सामने एक नए आत्मविश्वास के साथ खड़े होते हैं। प्रमुख वैश्विक सम्मेलनों की अध्यक्षता से लेकर विदेश नीति में स्वतंत्र रुख अपनाने तक, भारत की आवाज को आज दुनिया भर में सम्मान के साथ सुना जाता है। व्यापार और तकनीकी नेतृत्व भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया के लिए नवाचार का एक मॉडल बन चुका है। मेक इन इंडिया जैसी पहलों और लगातार बढ़ते स्टार्टअप इकोसिस्टम ने भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना दिया है। अत्याधुनिक राजमार्गों, हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर और विश्वस्तरीय हवाई अड्डों का तेजी से होता निर्माण यह दर्शाता है कि भारत भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर काम कर रहा है। ऐसे में समझा जा सकता है कि जिस तरह भारत विकास कर रहा है उससे देश विरोधी ताकतें परेशान हैं। वे किसी हाल में नहीं चाहती हैं कि भारत ताकतवर बने। देखा जाए तो अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब अभद्र भाषा या गाली-गलौज की अनुमति नहीं है। लोकतंत्र में लोकतंत्र के नाम पर देश के प्रधानमंत्री या किसी भी मंत्री के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने का अधिकार किसी को नहीं है। नीतियों पर बहस करना लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन संवैधानिक पदों की गरिमा गिराना नागरिक मर्यादा के खिलाफ है। यह प्रदर्शन आम तौर पर शांतिपूर्ण होना चाहिए था, लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ। सोशल मीडिया पर आए वीडियो में पुलिसकर्मियों, स्थानीय प्रशासन और रिपोर्टिंग कर रहे मीडियाकर्मियों के खिलाफ साफ तौर पर हिंसा देखी जा सकती है। ऐसे में कहा जा सकता है कि जो आंदोलन हिंसा, तोड़फोड़ और उपद्रव का सहारा लेता है, वह अपना नैतिक आधार खो देता है।इन आंदोलनों के पीछे के राजनीतिक इरादे उस समय और स्पष्ट हो जाते हैं जब हम विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों (जैसे पंजाब और कर्नाटक) की घटनाओं को देखते हैं। वहां भी प्रशासनिक चूकों और परीक्षा में धांधली की घटनाएं हुई हैं, लेकिन उन पर इस तरह के राष्ट्रव्यापी, सुनियोजित आंदोलन या आक्रामक मीडिया प्रचार देखने को नहीं मिलते। यह चयनात्मक विरोध साबित करता है कि इन आंदोलनों का मकसद देश में सुधार लाना नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाना है। वहीं इस आंदोलन को देखकर पूरी युवा पीढ़ी के बारे में राय बना लेना गलत होगा। सड़कों पर प्रदर्शन कर रही एक मुखर भीड़ पूरे देश के युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। भारत के करोड़ों युवा इन प्रदर्शनों का हिस्सा नहीं रहे। वे कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, कॉर्पोरेट दफ्तरों और स्टार्टअप्स में बैठकर दिन-रात देश के विकास में योगदान देते रहे।
सुप्रीम कोर्ट में कॉकरोच जनता पार्टी के छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने कहा कि छात्रों का प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और प्रदर्शन करना उनका संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने वालों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होगी। साथ ही 18 साल से कम उम्र के उन प्रदर्शनकारियों को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि पहली नजर में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत दिखती है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस कार्रवाई को लेकर पहले दिए गए दिशा-निर्देशों को अब अपडेट करने का समय आ गया है। 2018 में बने नियम 2026 में कितने कारगर हैं, इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए, ताकि प्रदर्शन शुरू होते ही पुलिस के तय प्रोटोकॉल तुरंत लागू हो सकें। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन कानून तोड़ने वालों को सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने बताया कि 250 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र जांच से प्रदर्शनकारियों और पुलिस, दोनों पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को रखी गई है। अब इसमें समझने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि आपराधिक प्रवृत्ति वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। चूंकि, पुलिस ने जो आंकड़े दिए हैं वह बेहद चौंकाने वाले हैं। पुलिस पर जो लोग हमला कर रहे थे उनमें हत्या, गैर इरादन हत्या, दुष्कर्म, आर्म एक्ट, लूट डकैती सहित कई संगीन अपराधी शामिल हैं। अगर पुलिस के यह आंकड़े सत्य हैं तो इस आंदोलन को नेपाल और बांग्लादेश जैसा हिंसक बनाने का पूरा प्रयास था। आप ने अरविंद केजरीवाल का बयान सुना होगा। जिसमें वे वह जेनजी को सीधे तौर पर उकसाने का प्रयास कर रहे हैं। वह अपील कर रहे हैं कि जिस तरह जेनजी ने नेपाल और बांग्लादेश की सरकार बदल दी उसी तरह यहां का जेन जी भी सरकार बदल सकता है। उन्होंने सरकार को आतंकवादी तक कह दिया। इस तरह की बयानबाजी के पीछे मंशा क्या है वह पूरा देश समझ रहा है।
पूरे आंदोलन का निचोड़ निकालने के बाद कहा जा सकता है कि प्रशासन से उच्च मानकों की मांग करना पूरी तरह से सही है। ऐसे में छात्रों की मांगों को लेकर केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन को सतर्क रहना चाहिए और जब भी किसी मुद्दे पर जनता के बीच असंतोष की भावना पनपने लगे, तो उस पर तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। समय पर की गई कार्रवाई और पारदर्शी संवाद से छात्रों की जायज चिंताओं को बाहरी ताकतों द्वारा भुनाए जाने से रोका जा सकता है। प्रशासनिक कमियों को स्वीकार करना और संस्थागत सुधार लागू करना कमजोरी की निशानी नहीं, बल्कि एक उत्तरदायी सरकार की पहचान है। फिर भी, किसी प्रशासनिक चूक की आलोचना करते समय बीते दशक में भारत द्वारा हासिल की गई ऐतिहासिक प्रगति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। देश की वर्तमान दिशा का सही मूल्यांकन करने के लिए हमें बड़े परिदृश्य पर नजर डालनी होगी। युवाओं की ऊर्जा देश के विकास का सबसे बड़ा इंजन है, लेकिन इस ऊर्जा को घरेलू राजनीतिक साजिशों और विदेशी ताकतों के बहकावे से बचाना बेहद जरूरी है। छात्र पारदर्शी व्यवस्था, त्वरित प्रशासनिक सुधार और करियर के बेहतर अवसरों के हकदार हैं।इसके साथ ही, आम नागरिकों को यह भी समझना होगा कि वास्तविक नागरिक अधिकारों की मांग और राजनीतिक एजेंडे के तहत किए जाने वाले प्रदर्शनों में क्या अंतर है। रचनात्मक आलोचना देश को मजबूत बनाती है, जबकि विदेशी हस्तक्षेप और राजनीतिक इस्तेमाल देश को कमजोर करता है। जैसे-जैसे भारत दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करना और देश की प्रगति पर गर्व करना ही आगे बढ़ने का सबसे संतुलित रास्ता है।





