जनप्रवाद, ब्यूरो, टीम। समंदर की अनंत गहराइयों में बेहद चौंकाने वाली खोज हुई है। शोधकर्ताओं के अनुसार समुद्र में गोल्ड किचन मिला है। यहां खुद ब खुद सोना बनता है। वैज्ञानिक इसे सोने की खान भी कह रहे हैं। इस विषय पर वे कई सालों से शोध कर हे थे। अब जाकर इस रहस्य के पीछे छिपी असली कहानी का पता चला है।
नए शोध ने पूरी दुनिया का ध्यान खींजा
अंतरिक्ष में सोना बनने की थ्योरी के बाद अब वैज्ञानिकों के नए शोध ने पूरी दुनिया का ध्यान खींज लिया है। यह शोध समंदर में सोना बनने को लेकर है। बता दें कि खौलते हुए लावा, टकराती समुद्री प्लेटें और पाताल की गहराई में यह राज आज तक छिपा हुआ था। अब विज्ञान के चमत्कार ने इसे सुलझा लिया है। जर्मनी के जियोमर सेंटर के वैज्ञानिकों ने समुद्र के सीने को चीरकर उसके नीचे छुपे सोने के विशाल भंडार का पता लगा लिया है। यह बात सुनने में भले ही दादी-नानी की काल्पनिक कहानी जैसी लगे, लेकिन अब यह बात सच साबित हुई है। विज्ञान की दुनिया में इसे मेंटल अल्केमी कहा जा रहा है। बता दें कि आखिर समुद्र के नीचे सोने के विशाल भंडार कैसे बनते हैं? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिक कई सालों से काम कर रहे थे।
जर्मनी के जियोमार हेल्महोल्ट्ज की खोज
बता दें कि जर्मनी के जियोमार हेल्महोल्ट्ज सेंटर फॉर ओशन रिसर्च कील के चीफ मरीन जियोलॉजिस्ट डॉ. क्रिस्टियन टिम ने शोधर्कर्ताओं के दल की अगुवाई की। उनके नेतृत्व में दक्षिण प्रशांत महासागर की गहराइयों में यह शोध किया गया। यह अहम रिसर्च अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक प्लेटफॉर्म कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट और नेचर में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट के अनुसार न्यूजीलैंड के पास स्थित केमार्डेक जैसे द्वीप समूह समुद्र के भीतर सोने के कारखानों की तरह काम करते हैं। ये अपार संपदा का निर्माण करते हैं। नई रिसर्च बताती है कि ये सोना आइलैंड आर्क्स की गहराई में अंदर जमा होता है। यह किसी एक प्रक्रिया की वजह से नहीं बल्कि बार-बार होने वाले उच्च तापमान की वजह से बनता है। वैज्ञानिकों के अनुसार जहां एक समुद्री प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धंसती है, वहां ज्वालामुखी द्वीपीय चाप बनते हैं। इन इलाकों में सोना बहुत ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। डॉक्टर टिम ने बताया कि हमारी रिसर्च से पता चलता है कि आइलैंड आर्क्स के नीचे पानी वाले मेंटल का पिघलना सोने बनने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब हम इन परिस्थितियों में मेंटल कैसे काम करता है, उसे देखते हैं तो यह मूल रूप से एक मल्टी-स्टेज (कई चरणों वाला) पिघलने का सिस्टम है, जो धीरे-धीरे सोने को बनाता, इकट्ठा करता और बढ़ाता जाता है।
ज्वालामुखी के कांच के 66 नमूने
वैज्ञानिकों ने न्यूजीलैंड के उत्तर में स्थित केमार्डेक आइलैंड के पास समुद्र की तलहटी से ज्वालामुखी के कांच के 66 नमूने लिए। जांच में पाया गया कि ये कांच तब बनते हैं, जब ज्वालामुखी का खौलता हुआ लावा पानी के नीचे अचानक ठंडा हो जाता है। इसके अंदर के असली केमिकल जस के तस बने रहते हैं। वैज्ञानिकों को इन सैंपल में कुछ ऐसे पुराने कांच मिले जो मैग्मा पिघला हुआ पत्थर के शुरुआती रूप को दिखाते हैं। रिसर्च में पता चला कि इन नमूनों में सोने की मात्रा समुद्र के अन्य हिस्सों के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी। शोध में वैज्ञानिकों ने धरती की परत से आने वाले गुप्त संकेतों को डिकोड कर लिया है। रिसर्च से पता चला है कि केमार्डेक आर्क के नीचे मौजूद धरती की परत तब पिघलती है, जब वह बहुत ज्यादा तापमान पर पानी के संपर्क में आती है। इस खास स्थिति में जो मैग्मा यानी पिघला हुआ पत्थर बनता है उससे सोना पैदा होता है। जांच में एक अनोखा पैटर्न भी सामने आया। ऐसा लगता है कि यहां की जमीन पहले एक बार पिघलकर खाली हो चुकी थी। जब मेंटल बहुत ऊंचे तापमान पर बार-बार पिघलता है और उसमें आॅक्सीजन की मात्रा बदलती है, तो वह सोना उगलने लगता है। पूरे मामले को देखें तो समझ में आता है कि सोना सबसे पहले मेंटल से निकलकर मैग्मा में आता है। यही मैग्मा आगे चलकर ज्वालामुखी बनाता है, यानी सतह तक पहुंचने से बहुत पहले ही सोना बनने की कहानी शुरू हो जाती है।





