जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। इसरो ने अंतरिक्ष में एक और इतिहास रचते हुए ईओएस-05 उपग्रह काूे लांच कर दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से यह प्रक्षेपण किया गया। ईओएस-05 को अंतरिक्ष कार्यक्रम में बड़ा कदम माना जा रहा है। यह जियोसिंक्रोनस आॅर्बिट से पृथ्वी की इमेजिंग करेगा, जिससे बड़े क्षेत्रों पर लगातार नजर रखने में मदद मिलेगी। इससे मौसम, प्राकृतिक आपदाओं, कृषि और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में निगरानी और जानकारी जुटाने की क्षमता बढ़ेगी। आइए नए उपग्रह के बारे में विस्तार से जानते हैं।
आठ महीने के गैप के बाद की वापसी
आठ महीने के गैप के बाद इसरो ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में महत्वपूर्ण वापसी करते हुए इतिहास रच दिया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने सतीश धवन स्पेस सेंटर से ईओएस-05 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने में सफलता हासिल कर ली है। इसे जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा गया है। बता दें कि यह सैटेलाइट जीआईसैट-1ए के नाम से भी जाना जाता है। इसका वजन करीब 2,367 किलोग्राम है। आज सुबह 2 बजकर 55 मिनट पर स्पेस सेंटर के दूसरे लॉन्च पैड से इसे लांच किया गया। यह जीएसएलवी की 19वां उड़ान है। यह इसरो का अब तक का सबसे भारी पेलोड माना जा रहा है। इसकी लंबाई करीब 51.7 मीटर और लिफ्ट-आफ मास करीब 420.5 टन है। रॉकेट के ऊपर 4 मीटर व्यास वाली ओगिव कंपोजिट पेलोड फेयरिंग लगी है, जिसके अंदर ईओएस-05 को रखा गया था।
आब्जर्वेशन सैटेलाइट महत्वपूर्ण उपग्रह
बता दें कि ईओएस-05 एक अत्याधुनिक अर्थ आॅब्जर्वेशन सैटेलाइट है। इसका मुख्य काम अंतरिक्ष से पृथ्वी की इमेजिंग करना है। इसका वजन करीब 2367 किलोग्राम है। ईओएस-05 को खासतौर पर जियोसिंक्रोनस आॅर्बिट से पृथ्वी की इमेजिंग के लिए तैयार किया गया है। इस आॅर्बिट में पहुंचने के बाद सैटेलाइट पृथ्वी के एक बड़े क्षेत्र को बार-बार देख सकेगा। इस मिशन को एनएसआईएल ने एक रणनीतिक उपयोगकर्ता के लिए समर्पित लॉन्च के तौर पर किया है। इसके साथ भारत और दूसरे देशों के उपयोगकतार्ओं के 18 सह-यात्री सैटेलाइट भी भेजे गए हैं। बता दें कि इमेजिंग का मतलब यहां सिर्फ पृथ्वी की सामान्य तस्वीर लेना नहीं है। सैटेलाइट में लगे सेंसर पृथ्वी की सतह से मिलने वाली जानकारी को रिकॉर्ड करते हैं। इस डेटा को प्रोसेस करके पृथ्वी की तस्वीर और उससे जुड़ी जरूरी जानकारी तैयार की जाती है। इससे किसी इलाके की जमीन की स्थिति, वनस्पति में बदलाव, फसलों की वृद्धि और आपदा से प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है। अगर इसे उदाहरण के समझें तो किसी इलाके में बाढ़ आने पर सैटेलाइट की तस्वीरों से पता लगाया जा सकता है कि पानी कितने क्षेत्र में फैला है। इसी तरह जंगल में आग लगने पर प्रभावित इलाके और आग के फैलाव की स्थिति पर नजर रखी जा सकती है। कृषि के क्षेत्र में इमेजिंग से फसलों की वृद्धि और वनस्पति की स्थिति पर नजर रखने में मदद मिल सकती है। वहीं, पर्यावरण के क्षेत्र में जमीन और वनस्पति में समय के साथ हो रहे बदलावों को समझा जा सकता है।
जीएसएलवी-एफ17 में तीन मुख्य स्टेज
जीएसएलवी-एफ17 में तीन मुख्य स्टेज हैं। पहला स्टेज यानी जीएस-1 में एस-139 और चार एल-40एच शामिल हैं। लॉन्च के समय इनके इग्निशन से थ्रस्ट पैदा होता है और रॉकेट तेजी से ऊपर बढ़ता है। पहले स्टेज का काम पूरा होने के बाद जीएस-1 सेपरेशन होता है। इसके बाद दूसरा स्टेज यानी जीएस-2 सक्रिय होता है। इसमें जीएल-40एचटी का इस्तेमाल किया गया। दूसरे स्टेज के अलग होने के बाद तीसरा स्टेज यानी जीएस-3 सक्रिय हुआ। इसे सीयूएस-15 कहा जाता है। इसमें तरल हाइड्रोजन और तरल आॅक्सीजन का इस्तेमाल होता है। तीसरे स्टेज का काम पूरा होने के बाद ईओएस-05 को निर्धारित सब-जीटीओ में स्थापित किया गया। इस मिशन की कामयाबी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इन तकनीकों का इस्तेमाल भविष्य के चंद्रयान-4, गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे मिशनों में किया जा सकता है। इसके अलावा शुक्रयान यानी वीनस आॅर्बिटर मिशन को मार्च 2028 में लांच करने का लक्ष्य है। यह शुक्र ग्रह की भूगर्भीय संरचना, वायुमंडल और आयनमंडल का अध्ययन करेगा। मिशन में एरोब्रेकिंग और थर्मल मैनेजमेंट जैसी उन्नत तकनीकों का भी प्रदर्शन किया जाएगा।





