जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। नासा के वैज्ञानिकों ने ऐसे एस्टेरॉयड के सच का पता लगाया है जो बेहद चौंकाने वाला है। यह एस्टेरॉयड कोई आम उल्कापिंड नहीं है। यह दो व्यक्तित्व रखता है। इसमें से पहला यह एक पत्थर दिखाई देता है लेकिन मौका पड़ते ही गैस उगलने लगता है। वैज्ञानिक इसे अंतरिक्ष का कालनेमि यानी वेष बदलने में माहिर एस्टेरॉयड बता रहे हैं।
30 साल से शोध कर रहे थे वैज्ञानिक
नासा के वैज्ञानिक एक खास एस्टेरॉयड की खोज करने के लिए पिछले 30 साल से शोध कर रहे थे। पिछले साल अगस्त, 2025 में गहरी रात को पृथ्वी से मात्रा 30 लाख किलोमीटर दूरी से अचानक एक एस्टेरॉयड गुजरा। पहले तो वैज्ञानिकों ने इसे साधरण उल्कापिंड मानकर शोध शुरू किया। जैसे-जैसे यह अध्ययन आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे इस एस्टेरॉयड की सच्चाई समाने आने लगी। वैज्ञानिकों ने जब पूरा सच देखा तो हैरान रह गए। शोधकर्ताओं ने जांच में पाया कि यह तो वहीं एस्टेरॉयड है जिसकी खोज लगातार 30 साल से हो रही थी। वैज्ञानिकों ने इसका नाम 1998 एसएच-2 रखा है। यह पूरी ख्रोज दक्षिणी कैलिफोर्निया स्थित नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने की है। यह खोज सिनेमा की किसी थ्रिलर से कम नहीं लग रही है। नासा के अनुसार यह एक ऐसा पिंड है जो दो व्यक्तित्व रखता है। देखने में तो यह एक पत्थर जैसा लगेगा। जैसे ही इसके पास कोई जाने की कोशिश करेगा यह खतरनाक गैस उगलने लग जाता है। बता दें कि करीब तीन दशक से वैज्ञानिक इसे लेकर उलझे हुए थे। अब जाकर इस अंतरिक्ष की एक रहस्यमयी वस्तु का सच सामने आया है।
वैज्ञानिकों ने नए अध्ययन का किया खुलासा
नासा के वैज्ञानिकों के नए अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिक इसे अंतरिक्ष का कालनेमि बता रहे हैं। बता दें कि जब वैज्ञानिकों ने आॅप्टिकल एस्ट्रोमेट्री से सटीक स्थिति मापी तो नॉन-ग्रेविटेशनल प्रभाव साफ दिख रहे थे। यहे ऐसे ऐसे परिवर्तन, जो किसी साधारण एस्टेरॉयड में नहीं होते। जेपीएल के नेविगेशन इंजीनियर डेविड फार्नोचिया ने इस बारे में विस्तार से जानकरी दी है। उन्होंने बताया कि जब हमने इन बदलावों को समझा तो एहसास हुआ कि यह कोई साधारण क्षुद्रग्रह नहीं हो सकता। यह सक्रिय धूमकेतु जैसा व्यवहार कर रहा था। 1998 से इस पर गहरी नजर रखी जा रही थी। कोई दूरबीन इसे पूरी तरह देख नहीं पाई। जब यह 2025 में घरती के पास आया, तो वैज्ञानिकों ने सारे पुराने डेटा को फिर से खंगाला और नतीजा चौंकाने वाले मिले। यह पथरील पिंड सूक्ष्म गैस छोड़ रहा था। शोधकर्ताओं के अनुसार पथरील पिंड इसलिए गैस छोडने लगा क्योंकि सूर्य की गर्मी से अंदर छिपी बर्फ अचानक पिघलने लगी। इससे गैस बनने लगी थी। यह गैसे इस पिंड को धक्का देने लगी थी।
बेहद रहस्यमयी है ब्रह्मांड
वैज्ञानिकोें के अनुसार ये सिर्फ एक पिंड की पहचान नहीं हैं बल्कि हमें याद दिलाती है कि ब्रह्मांड कितना रहस्यमयी है। हमारे सौर मंडल में ऐसे कितने डार्क कॉमेट्स छिपे हो सकते हैं, जो चुपके से अपनी गैस छोड़ते हुए कक्षाएं बदल रहे हैं। वैज्ञानिकों के सामने सबसे अहम सवाल यह है कि क्या ये भविष्य में पृथ्वी के लिए खतरा बन सकते हैं। इस पर वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस बारे में पूरी तरह से कुछ नहीं कहा जा सकता है। इस पर जैसे-जैसे शोध आगे बढ़ेगा वैसे-वैसे पूरी जानकारी सामने आएगी। बता दें कि नासा के वैज्ञानिकों ने एक सच को स्वीकार किया कि कॉमिट एस्टेरॉयड ज्यादा प्रलयकारी और खतरनाक होते हैं। जब ये पृथ्वी पर हमला करेंगे यानी धरती से टकराएंगे तो संभलने का मौका तक नहीं देंगे। यदि समान आकार का एक एस्टेरॉयड और एक कॉमेट पृथ्वी की ओर बढ़े, तो कॉमेट कहीं अधिक तबाही मचाएगा। बता दें कि एस्टेरॉयड आमतौर पर 15 से 25 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से पृथ्वी से टकराते हैं। सौर मंडल के बाहरी छोर से आते हैं। वहीं इसकी गति 50 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड तक होने का अनुमान जताया गया है।





