नई दिल्ली, एजेंसी। केंद्र सरकार ने दावा किया है कि गंगा का पानी निगरानी किये गये सभी स्थलों पर स्नान के मानकों पर खरा उतरता है और इस नदी में प्रदूषण का स्तर घट रहा है। जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने बृहस्पतिवार को लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि 2025 (जनवरी से अगस्त) के औसत जल गुणवत्ता आंकड़ों के आधार पर, नदी का पीएच और घुलित आक्सीजन स्तर सभी स्थानों पर स्नान के मानदंडों को पूरा करता है। चौधरी ने कहा कि जैव-रासायनिक आक्सीजन मांग (बीओडी) के संदर्भ में पानी की गुणवत्ता उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में नदी के पूरे प्रवाह में स्नान मानकों के अनुरूप है। उन्होंने बताया कि इनमें से 4,050 एमएलडी क्षमता की 138 मलजल शोधन संयंत्र परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और चालू कर दी गई हैं।
मंत्री ने बताया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान और राज्य वन विभागों के सहयोग से डॉल्फिन, ऊदबिलाव, हिलसा, कछुए और घड़ियाल जैसी जलीय प्रजातियों के लिए बचाव एवं पुनर्वास कार्यक्रम चलाए गये हैं तथा जलगुणवत्ता की वजह से इन प्रजातियों की संख्या में वृद्धि हुई है। उन्होंने औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के संबंध में कहा कि तीन सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र - जाजमऊ (20 एमएलडी), बंथर (4.5 एमएलडी) और मथुरा (6.25 एमएलडी) - स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से दो पूरे हो चुके हैं।
हालांकि, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों- जैसे फरुर्खाबाद से कानपुर के पुराना राजापुर तक, रायबरेली के डलमऊ, और गाजीपुर के तारीघाट तक मिजार्पुर के निचले हिस्से- में यह मानकों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता। उन्होंने कहा कि गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 50 स्थानों और यमुना नदी के किनारे 26 स्थानों पर 2024-25 के दौरान की गयी जैव-निगरानी से ज्ञात होता है कि जैविक जल की गुणवत्ता मुख्य रूप से मध्यम श्रेणी में है, जो जलीय जीवन को बनाए रखने के लिए नदियों की पारिस्थितिक क्षमता को दशार्ती है। मंत्री ने कहा कि गंगा और उसकी सहायक नदियों की सफाई और पुनरुद्धार के लिए नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत विविध और विस्तृत कदम उठाए गए हैं , जिनमें अपशिष्ट जल उपचार, नदी तट प्रबंधन, प्रवाह सुनिश्चित करना, ग्रामीण स्वच्छता, वनीकरण, जैव विविधता संरक्षण और जन भागीदारी शामिल हैं। नदी में इतना पानी लगातार बहता रहे कि उसका प्राकृतिक जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रहे, इसे ही ई-प्रवाह कहा जाता है। उन्होंने बताया कि फरवरी 2026 तक कुल 524 परियोजनाओं को 43,030 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी दी गई है, जिनमें से 355 पूरी हो चुकी हैं। चौधरी ने बताया कि इनमें से 218 जलमल शोधन अवसंरचना परियोजनाएं शामिल हैं, जिनकी लागत 35,794 करोड़ रुपये है। इन परियोजनाओं की शुरूआत नदी में प्रदूषण के स्तर को सुधारने के लिए की गई थी, जिनकी कुल मलजल शोधन क्षमता 6,610 एमएलडी है।
पीएच (पोटेंशियल आॅफ हाइड्रोजन) किसी तरल पदार्थ या विलयन में हाइड्रोजन आयनों की सांद्रता को मापकर उसकी अम्लीयता या क्षारीयता बताने वाला एक पैमाना है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) पांच राज्यों के कुल 112 स्थासनों पर गंगा नदी की जल गुणवत्ता की निगरानी करता है, जिनमें उत्तराखंड में 19, उत्तर प्रदेश में 41, बिहार में 33, झारखंड में चार और पश्चिम बंगाल में 15 स्थान शामिल हैं।
चौधरी ने दिया बयान





