जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। वैज्ञानिकों के एक महाप्रयोग से अब अंतरिक्ष यानी पृथ्वी जैसे अनुकूल वातावरण वाले ग्रहों में खेती की जा सकेगी। नासा ने एक खास मिशन के तहत टमाटर के लाखों बीज इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर भेजे। कई साल तक ये बीज वहीं रहे। फिर वापस लाने के बाद उसे दुनिया के 40 देशों में लगाया गया। अब इसकी स्टडी से चौंकाने वाला नतीजा सामने आया है।
अंतरिक्ष में इंसानों को बसाने की योजना के तहत प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसियां और निजी कंपनियां सबसे पहले चांद और मंगल ग्रह पर स्थायी बस्तियां बनाने की तैयारी कर रही हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा चांद के दक्षिणी ध्रुव पर एक स्थायी बेस बनाने की योजना पर काम कर रही है। बताया जा रहा है कि दक्षिणी ध्रुव के छाए हुए गड्ढों में बर्फ के रूप में पानी मौजूद है, जिसे पिघलाकर पीने, आॅक्सीजन और रॉकेट ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस दिशा में नासा के साथ ब्लू ओरिजिन और स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियां जुटी हुई हैं। वहीं भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो भी इस दिशा में काम कर रही है। चीन और रूस मिलकर अलग से लूनर रिसर्च स्टेशन बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं।
अब नासा के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में बड़ा प्रयोग किया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 1984 में टमाटर के करोड़ों बीज अंतरिक्ष में भेजे थे। इसमें नासा हेडक्वार्टर, लैंगली रिसर्च सेंटर और अमेरिका में बीजों की पारंपरिक सप्लायर कंपनी जॉर्ज डब्ल्यू पार्क सीड शामिल थीं। इस प्रयोग के पीछे आइडिया यह था कि बीजों का एक ग्रुप अंतरिक्ष में भेजा जाए और एक ग्रुप पृथ्वी पर रखा जाए। एक जैसे बीजों के दोनों सेट स्कूलों में बांटे जाएं। छात्र उन्हें अगल-बगल उगा सकें और नतीजों की तुलना कर सकें। सभी 1 करोड़ 25 लाख बीज कैलिफोर्निया सुप्रीम किस्म के थे, जो अमेरिका में उगाई जाने वाली टमाटर की एक आम किस्म है। इस बीज को इसलिए चुना गया था क्योंकि एक ही किस्म का इस्तेमाल करने से जेनेटिक अंतर के कारण नतीजों में गड़बड़ी नहीं होती।
बता दें कि जिन उपकरणों से बीजों को अंतरिक्ष में ले जाया गया, वह लांग ड्यूरेशन एक्सपोजर फैसिलिटी था। यह 12 तरफ वाला बेलनाकार ढांचा था, जिसका वजन 9.7 टन था। इसे अंतरिक्ष में स्थिर रहने के लिए डिजाइन किया गया था। इन बीजों की वापसी के बाद योजना के अनुसार प्रोजेक्ट का शैक्षिक चरण शुरू हुआ। नासा की शैक्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 40,000 स्कूलों में शिक्षकों को करीब 1,32,000 प्लांटिंग किट बांटी गईं, जो 33 लाख छात्रों तक पहुंचीं। इसमें अमेरिका के सभी 50 राज्य, डिस्ट्रिक्ट आॅफ कोलंबिया और दुनिया के 30 अन्य देश शामिल थे। हर किट में बीजों के दोनों समूह थे। छात्रों ने नोट किया कि कितने बीज अंकुरित हुए, पहला अंकुर निकलने में कितना समय लगा और हफ्तो के दौरान पौधे कैसे बढ़े। उन्होंने फूलों के दिखने, फल बनने और पत्तियों व तनों की हालत को भी नोट किया। एजेंसी को करीब 8,000 रिपोर्ट मिलीं। डेटा से पता चला कि स्पेस के बीजों के अंकुरण की दर 73.8% जबकि पृथ्वी के बीजों के लिए 70.3% थी। वापस लाने के बाद पहले छह महीनों में किए गए टेस्ट में स्पेस के बीजों में औसतन 8 दिनों में अंकुरण हुआ, जबकि पृथ्वी के बीजों में 8.3 दिन लगे। शुरूआती तीन हफ्तों में शुरूआती बढ़त तेजी से होने की प्रवृत्ति देखी गई। प्रोजेक्ट की समरी में पौधों या फलों के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया। यानी इस एक्सपेरिमेंट से पता चला कि स्पेस में छह साल रहने के बाद भी टमाटरों में कोई स्थायी बदलाव नहीं आया। बता दें कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो भी इस दिशा में काम रह रहा है। इसरो ने अंतरिक्ष में सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण परिस्थितियों के तहत केवल 4 दिनों में लोबिया के बीजों को सफलतापूर्वक अंकुरित कर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। इन बीजों को 30 दिसंबर 2024 को पीएसएलवी-सी60 रॉकेट के जरिए स्पेडेक्स मिशन के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष में भेजा गया था।





