जन प्रवाद, ब्यूरो।
नोएडा। मुस्लिम समुदाय में आपने लड़कों के खतने के बारे में जरूर सुना होगा, लेकिन क्या आपको पता है कि दाऊदी बोहरा समुदाय में छोटी बच्चियों का भी खतना किया जाता है। यह खतना इतना खतरनाक होता है कि उन्हें पूरी जिंदगी असहनीय पीड़ा से जूझना पड़ता है। यही नहीं खतना के दौरान हजारों नसें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। आप पूरी खबर पढ़कर हैरान रह जाएंगे।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को बच्चियों का खतना करने पर बहस हुई। इस प्रथा पर सवाल उठाते हुए दाऊदी बोहरा महिला ने कहा कि इससे बच्चियों के स्वास्थ्य को खतरा होता है और उनकी गरिमा से भी समझौता होता है। महिला ने कहा कि इस प्रथा को तो पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध घोषित किया जाना चाहिए और इसकी सजा मिलनी चाहिए।

बता दें में दाऊदी बोहरा समुदाय की महिला मासूमा रानालवी की ओर से पेश वकील सिद्धार्थ लूथरा ने चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि खतना की यह प्रथा 7 साल की बच्चियों के साथ होती है। जब सात साल की बच्ची के साथ इसे अंजाम दिया जाता है तो फिर सहमति का कहां से उठता है। उन्होंने कहा कि बच्ची की सहमति की बात नहीं हो सकती और उसके परिजन सामाजिक दबाव के कारण ऐसे होने देते हैं। अगर कोई व्यक्ति इसका विरोध करता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार हो जाता है और फिर वह इस स्थिति में आ जाता है, जहां उसको समाज का बॉयकॉट झेलना पड़ता है। समाज के साथ उनके आर्थिक और सामाजिक रिश्ते खत्म हो जाते हैं। लूथरा ने कहा कि इस विषय को भले ही सामाजिक प्रथा कहा जा रहा है, लेकिन जिस तरह से एक बच्ची को पीड़ा झेलनी पड़ती है वह मामला संवैधानिक और आपराधिक दायरे में चला जाता है। ऐसे में इस पर विचार करना चाहिए।

इस मामले में सुनवाई करने वाली बेंच में चीफ जस्टिस सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार सहित 9 जज शामिल हैं। इस केस की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने हैरानी भी जताई कि आखिर इसके खिलाफ कोई कानून क्यों नहीं बना है। उन्होंने कहा कि इस तरह से बच्चियों का जो खतना होता है, उससे उनके अंग प्रभावित होते हैं। ऐसे में कोई कानून जरूर बनना चाहिए। जिससे इस पर रोक लग सके। अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में कानून बनाकर रोक लगाने का अधिकार तो सरकार के पास ही है।





