जलवायु परिवर्तन से दुनिया में आएगी तबाही, गायब हो गया दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। जलवायु परिवर्तन से दुनिया में तबाही आएगी। वैज्ञानिकों ने इसको लेकर बड़ी चेतावनी दी है। सबसे बड़ा खतरा दुनियाभर के हिमखंडों पर दिखाई दे रहा है। एक ओर जहां दुनिया के सबसे बड़े हिमखंड का अंत हो गया वहीं दो दशकों में कश्मीर के पर्वतीय इलाकों का तापमान एक डिग्री बढ़ गया है। इससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन को लेकर चेतावनी

दुनियाभर के वैज्ञानिक लगातार जलवायु परिवर्तन को लेकर चेतावनी दे रहे हैं। उनके अनुसार इसका असर किसी एक देश तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह दुनियाभर में तबाही लाएगा। इसको लेकर दो शोध में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। वैज्ञानिकों ने पाया कि दुनिया के सबसे बड़े हिमखंड अंत हो चुका है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह अंटार्कटिका से चार दशक पहले टूटकर अलग हुआ था। इसे दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड माना जाता था। इसका नाम ए23ए रखा गया था। अब यह लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है। ग्लोबल वार्मिंग का इस पर तेजी से असर पड़ा। वैज्ञानिक इस घटना को बड़ी प्राकृतिक आपदा के रुप में देख रहे हैं। बता दें कि अपने असाधारण आकार और लंबी उम्र के कारण ए23ए केवल प्राकृतिक अजूबा नहीं रहा, बल्कि महासागरीय धाराओं, समुद्री पारिस्थितिकी और जलवायु तंत्र को समझने के लिए वैज्ञानिकों की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रयोगशालाओं में से एक बन गया था। नेशनल ज्योग्राफिक में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार ए23ए की पूरी यात्रा ने यह समझने में नई मदद दी है कि विशाल हिमखंड कैसे बनते हैं। दशकों तक जीवित कैसे रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इस हिमखंड से यह भी समझा कि जब ये समाप्त होते हैं तो उनका समुद्री पारिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ता है। 
अंटार्कटिक सर्वे में छिपा है खजाना

ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे समेत कई वैज्ञानिक दलों ने ए23ए के आसपास समुद्री जल और जैव विविधता का अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि हिमखंड के पिघलने से निकलने वाला मीठा पानी समुद्री जल की रासायनिक संरचना और पोषक तत्वों के वितरण को प्रभावित करता है। इससे सूक्ष्म समुद्री जीवों से लेकर बड़े समुद्री जीवों तक पूरे खाद्य तंत्र पर असर पड़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे हिमखंड महासागरों में पोषक तत्वों के प्राकृतिक परिवहन का भी काम करते हैं।
आईआईटी खड़गपुर ने किया अध्ययन

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी खड़गपुर के सेंटर फॉर ओशियन, रिवर, एटमॉस्फियर एंड लैंड साइंसेज के वैज्ञानिकों ने बड़ा अध्ययन किया। यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है। इसमं 1980 से 2024 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती गर्मी का स्पष्ट संकेत मिला। जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर असर अब हिमालयी क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय इलाकों का तापमान पिछले दो दशकों में करीब एक डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ऐसा ही जारी रहा तो हिमालय के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ेंगे, जिससे भविष्य में बाढ़, भूस्खलन और जल संकट जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।  अध्ययन में सामने आया है कि ऊंचाई वाले क्षेत्र अपेक्षाकृत निचले इलाकों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। मध्य ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान 0.3 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। वहीं जम्मू जैसे मैदानी क्षेत्रों में यह वृद्धि लगभग 0.1 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक दर्ज की गई।
एशिया का वाटर टावर है हिमालय

हिमालय को एशिया का वाटर टावर कहा जाता है। यहां से निकलने वाली गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां करोड़ों लोगों की पेयजल, सिंचाई और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ग्लेशियरों के पिघलने की वर्तमान गति जारी रही तो शुरूआती वर्षों में अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ेंगी, जबकि लंबे समय में नदियों के जल प्रवाह में कमी आने से गंभीर जल संकट पैदा हो सकता है। इसका सीधा प्रभाव कृषि, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन पर पड़ेगा। शोधकर्ताओं के अनुसार समय रहते इसको रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना जरुरी है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बढ़ती गर्मी के कारण आने वाले वर्षों में जल संसाधनों, पर्यावरण और करोड़ों लोगों की आजीविका पर गहरा असर पड़ेगा।