जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। वैश्विक रक्षा परिदृश्य में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। इसमें एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी देश चीन को घेरने के लिए नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ भारत ने भी समंदर में चीन की दादागिरी खत्म करने के लिए तगड़ा प्लान बना लिया है।
ईरान युद्ध से लिया सबक
पश्चिम एशिया में चल रहे ईरान युद्ध के कारण हथियारों का स्टॉक तेजी से खत्म होने की चिंता के बीच, अमेरिकी डिफेंस स्टार्ट-अप कोवेनेंट ने बड़ा दांव चला है। कंपनी ने कम लागत वाली लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल एंथम के बड़े पैमाने पर उत्पादन की घोषणा की है। जर्मनी के सैक्सोनी में शुरूआती 1,000 मिसाइल प्रतिवर्ष और फिर 5,000 प्रतिवर्ष क्षमता वाले प्लांट से 2027 में इसका उत्पादन शुरू होगा। यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि पहली बार किसी मिसाइल को विशेष रूप से चीन के खिलाफ संभावित इंडो-पैसिफिक युद्ध को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। अमेरिकी स्टार्ट-अप कोवेनेंट के अनुसार यह बेहद किफायती एंथम क्रूज मिसाइल है। इसकी कीमत महज 500,000 डॉलर यानी लगभग 4.5 करोड़ है। यह भारत की ब्रह्मोस से करीब 9 गुना और अमेरिका की टॉमहॉक से 4 गुना सस्ती है। यह मिसाइल 200 किलोग्राम से ज्यादा पेलोड ले जाने में सक्षम है। वहीं सॉलिड रॉकेट बूस्टर और जेट इंजन से लैस यह मिसाइल 2027 से जर्मनी, यूएस और इजराइल में सालाना 12,000 से ज्यादा की संख्या में बनेगी। इसका मुख्य लक्ष्य इंडो-पैसिफिक में चीन को घेरना है। बता दें कि एंथम जमीन से दागी जाने वाली क्रूज मिसाइल है। यह दुश्मन के बंकरों, रडार स्टेशनों और रसद डिपो को पूरी तरह तबाह करने में सक्षम है।
श्रीलंका को लेकर भारत की नई रणनीति
दूसरी ओर हिंद महासागर में छोटे देश श्रीलंका को लेकर भारत ने नई रणनीति बना ली है। बता दें कि श्रीलंका की लोकेशन की वजह से यहां कंट्रोल हासिल करने के लिए चीन लंबे समय से दांव-पेच लगा रहा है। अब श्रीलंका को बचाने के लिए भारत दीवार बनकर खड़ा हो गया है। यहां पर भारत का महासागर मिशन शुरू होने जा रहा है। इस प्लान मे शािमल 5 मास्टरस्ट्रोक के धरती पर उतरते ही चीन का नॉक आउट होना तय है। इसके साथ ही दोनों देश मिलकर ब्लू इकोनॉमी जरिए दोस्ती की नई इबारत भी लिखने जा रहे हैं। पीएम मोदी को महासागर विजन का संदेश लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कोलंबो पहुंचे। इस दौरान सहमति बनी है कि दोनों देश मिलकर अपनी समुद्री सीमाओं को फौलादी बनाएंगे और आर्थिक मजबूती के एक नए रास्ते पर साथ आगे बढ़ेंगे। अब इस इलाके में भारत और श्रीलंका मिलकर एक नया और आधुनिक सर्विलांस सिस्टम बनाएंगे। इस सिस्टम का सीधा सा मतलब ये है कि अब दोनों देशों की नेवी और कोस्ट गार्ड समुद्र में चलने वाली हर एक नाव और जहाज पर 24 घंटे पल-पल नजर रखेंगे। इस आधुनिक तकनीक के आते ही समुद्र में बिना इजाजत घूमने वाले अज्ञात और संदिग्ध जहाजों की पोल तुरंत खुल जाएगी। इतना ही नहीं, ये कदम नशीले पदार्थों की तस्करी, अवैध हथियारों की स्मगलिंग और समुद्री आतंकवाद की कमर तोड़ने के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा। भारत और श्रीलंका मिलकर हिंद महासागर की पहरेदारी करेंगे तो चीन के गुप्त जासूसी जहाजों के लिए इस इलाके में बिन बुलाए मेहमान बनना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का संदेश
बता दें कि कोलंबो के बड़े सम्मेलन में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूरी दुनिया को एकदम साफ बता दिया कि भारत और श्रीलंका सिर्फ नाम के पड़ोसी नहीं हैं, बल्कि दोनों का भविष्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत का महासागर विजन भी बिल्कुल इसी सोच पर टिका है। इस मिशन के तहत भारत श्रीलंका की फौज को और मजबूत बनाएगा। उनके अफसरों को नई-आधुनिक ट्रेनिंग देगा। रक्षा मंत्री ने साफ कह दिया है कि समंदर में किसी भी खतरे के आने का इंतजार नहीं करना है, बल्कि उसे शुरू होते ही खत्म कर देना है। भारत और श्रीलंका का ये साझा सुरक्षा प्लान सिर्फ सीमाओं की रखवाली तक नहीं रहेगा, बल्कि ये पूरे इलाके में शांति और कारोबार को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी गारंटी बनेगा। इसके पीछे की कहानी तब शुरू हुई जब श्रीलंका इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक संकट, महंगाई और दिवालियापन से जूझ रहा था, तब चीन ने अपने पैर पीछे खींच लिए थे। ऐसे समय में सिर्फ भारत ही वो पहला देश था जिसने बिना किसी शर्त के आगे बढ़कर अरबों डॉलर की मदद भेजी और श्रीलं। साथ ही श्रीलंका को डूबने से बचाया। कोलंबो में भारतीय रक्षा मंत्री से मुलाकात के बाद श्रीलंका के वरिष्ठ नेता साजित प्रेमदासा ने खुले मंच से भारत के इस एहसान को स्वीकार किया। प्रेमदासा ने साफ शब्दों में कहा कि चीन ने श्रीलंका को महंगे ब्याज दरों पर कर्ज देकर हम्बनटोटा बंदरगाह 99 साल के पट्टे पर हड़प लिया था लेकिन भारत की बिना कुछ बदले में मांगे मदद ने श्रीलंकाई जनता और नेताओं का दिल जीत लिया है। अब श्रीलंका समझ चुका है कि चीन सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए आता है, जबकि भारत हर मुश्किल घड़ी का सच्चा साथी है। इसी सिलसिले में श्रीलंका ने भी एक बड़ा कदम उठाने का मन बनाया है। श्रीलंकाई लीडरशिप ने इच्छा जताई है कि वो भारत को अपना सबसे बड़ा निर्यात बाजार बनाना चाहते हैं। चीन के महंगे माल की जगह अब भारत और श्रीलंका के बीच संतुलित और मुक्त व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा है।





