एफसीआरए संशोधन विधेयक का भारत से अमेरिका तक क्यों हो रहा विरोध, इस विधेयक में क्या है खास

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। संसद के मानसून सत्र में आज एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 पर महत्वपूर्ण चर्चा हो सकती है। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर सदन में आज अपना बयान दे सकते हैं। इस विधेयक में लोगों की दिलचस्पी इसलिए ज्यादा है क्योंकि इस विधेयक के खिलाफ न केवल विपक्ष लामबंद हो रहा है बल्कि अमेरिकी सांसद ने जोरदार विरोध दर्ज कराया है।
विदेशी फंडिंग होगी नियंत्रित

विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले कानून विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए संशोधन विधेयक में प्रस्तावित संशोधन इन दिनों चर्चा में है। इसकी वजह सिर्फ देश के भीतर की बहस नहीं, बल्कि अमेरिका की प्रतिक्रिया भी है। विपक्ष, सरकार और अब अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियों में है। बता दें कि संसद के मॉनसून सत्र का यह तीसरा हफ्ता है। बीते दो हफ्ते तो काफी हंगामेदार रहे। इस दौरान पेपर लीक और परीक्षा से जुड़े छात्रों के मुद्दे सदन की कार्यवाही पर हावी रहे। अब आज ससंद सत्र के तीसरे हफ्ते में सरकार एफसीआरए में बदलाव का बिल लाने जा रही है। इस बिल को विदेशी फंड से चलने वाले एनजीओ पर स्ट्राइक कहा जा रहा है। इसको लेकर काफी हंगामा हो रहा है।  सरकार इस विधेयक को संसद में पेश कर चर्चा और पारित कराने की तैयारी में है। वहीं विपक्ष संसद में नीट पेपर लीक को लेकर हुए प्रदर्शनों में छात्रों पर लाठीचार्ज को लेकर गृहमंत्री अमित शाह से बयान की मांग कर रहा है। जिसके चलते सदन का कामकाज प्रभावित हो रहा है। इसके बाद भी सरकार मानसून सत्र में ही इस बिल को पास कराना चाहती है। सूत्रों के अनुसार आज गृहमंत्री शाह से विधेयक पर चर्चा के दौरान भाग ले सकते हैं। बता दें कि यह अमित शाह का मौजूदा संसदीय गतिरोध के बीच पहला बड़ा भाषण होगा।
गतिरोध खत्म करने को लेकर बैठक

बता दें कि संसद में गतिरोध खत्म करने के लिए नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ किरेन रिजिजू ने करीब 50 मिनट तक बैठक की। इस दौरान प्रियंका गांधी भी मौजूद थीं। राहुल ने रिजिजू से कहा कि नीट पेपर लीक मामले में विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ हिंसा पर गृह मंत्री अमित शाह का बयान और अयोध्या में राम मंदिर में दान की गई राशि की कथित चोरी पर चर्चा सदन चलाने के लिए बेहद जरूरी शर्तें हैं। विपक्ष सदन की कार्यवाही से शाह की गैरमौजूदगी पर सवाल उठा रहा है। एफसीआरए संशोधन विधेयक के खिलाफ लगभग पूरा विपक्ष लामबंद हो चुका है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन से केंद्र सरकार को विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने की शक्ति मिल सकती है। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि इससे चर्च, ईसाई शैक्षणिक संस्थानों और अन्य अल्पसंख्यक संस्थाओं के हित प्रभावित हो सकते हैं।  इसी तरह तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी विधेयक का विरोध करते हुए कि यह ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों को प्रभावित कर सकता है। उनका आरोप है कि मामूली प्रक्रियागत चूक के आधार पर पंजीकरण रद्द होने की स्थिति में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अनाथालय जैसी संस्थाओं की संपत्तियां भी प्रभावित हो सकती हैं।  इसके अलाव कई अन्य विपक्षी सांसदों ने भी इस विधेयक का विरोध किया है। देखा जाए तो जहां एक तरफ विपक्ष इसे खतरनाक बता रहा है तो वहीं सरकार का कहाना है कि यह कानून केवल उन लोगों पर नकेल कसेगा जो विदेशी फंड का गलत इस्तेमाल करते हैं। साथ ही इससे अवैध धर्म परिवर्तन में शामिल लोगों पर नकेल कसी जा सकेगी। 
अमेरिका में भी विरोध

दूसरी ओर इस विधेयक का विरोध अमेरिका में भी हो रहा है। वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने कहा कि एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधन भारतीय सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन अपने हाथ में लेने की अनुमति देंगे। उन्होंने इसे ईसाइयों पर स्पष्ट हमला बताया। मूर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ दशक बाद ही संत थॉमस भारत के मालाबार तट पर पहुंचे थे। तब से भारत में ईसाइयों का इतिहास रहा है। इसके बावजूद भारत की संसद विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन नियमों में बदलाव करने पर विचार कर रही है। इससे सरकार चर्चों और धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकती है।  अब हम यह भी जान लेते हैँ कि विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, यानी एफसीआरए क्या है। बता दें कि यह कानून तय करता है कि भारत में कोई एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक संगठन, कंपनी या व्यक्ति विदेश से मिलने वाला धन किन शर्तों पर प्राप्त कर सकता है। साथ ही यह भी तक होगा कि उनका उपयोग कैसे किया जाए। इस कानून का मुख्य उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाना, उसके उपयोग की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कार्यों में न हो। इस कानून का संचालन गृह मंत्रालय करता है।
प्रावधानों को आसान भाषा में समझे 

नए विधेयक के प्रावधानों को आसान भाषा में समझे तो इसमें कई प्रावधान लागू होंगे। नए बिल में सबसे बड़ा बदलाव एक नई संस्था बनाने का है जिसे नामित प्राधिकरण कहा जाएगा। वहीं अगर किसी संस्था का रजिस्ट्रेशन रद्द होता है या खुद सरेंडर करती है या रिन्यू नहीं होता, तो उसका विदेशी फंड और उससे बनी संपत्ति इसी प्राधिकरण के पास चली जाएग। सरकार चाहे तो यह संपत्ति किसी विभाग को दे सकती है या बेच सकती है, और बिक्री का पैसा सरकारी खजाने में जमा होगा। सरकार का कहना है कि किसी भी धार्मिक स्थल का धार्मिक स्वरूप नहीं बदला जा सकेगा। चर्च, मंदिर, मस्जिद या अन्य धार्मिक संस्थानों की धार्मिक पहचान कानून के तहत सुरक्षित रहेगी। अगर कोई संस्था नामित प्राधिकारी के फैसले से असहमत होती है तो उसे पहले पुनर्विचार और फिर जिला न्यायालय में अपील करने का अधिकार होगा। इसी तरह अगर कोई संस्था समय पर एफसीआरए पंजीकरण का नवीनीकरण नहीं कराती तो उसका पंजीकरण स्वत: समाप्त माना जाएगा। एफसीआरए उल्लंघन के मामलों में अधिकतम सजा पांच साल से घटाकर एक साल करने का प्रावधान किया गया है। राज्य सरकारों और उनकी एजेंसियों को एफसीआरए से जुड़े मामलों में जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी। अब एफसीआरए पंजीकरण में संस्था को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वह विदेशी अंशदान किस उद्देश्य के लिए प्राप्त करेगी। साथ ही यह भी बताना होगा कि उसका काम किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में होगा। पहले सामान्य श्रेणियों में अनुमति मिल जाती थी, लेकिन अब गतिविधियों और राज्यों के हिसाब से अलग-अलग और स्पष्ट अनुमति दी जाएगी। पहले से पंजीकृत संस्थाओं को भी एक वर्ष के भीतर बताना होगा कि वे किन उद्देश्यों और किन राज्यों के लिए अपना पंजीकरण जारी रखना चाहती हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो एफसीआरए विधेयक का मकसद विदेशी फंडिंग नियमों को और सख्त बनाना है। इसके साथ ही पारदर्शिता बढ़ाना और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है। इसमें एनजीओ और संगठनों के लिए सख्त पंजीकरण, आॅडिट, रिपोर्टिंग और संपत्ति संबंधी प्रावधान शामिल हैं।