नहीं रहे, डीएनए फिंगर प्रिंट के जनक, बीएचयू से लेते थे एक रूपए सैलेरी

लखनऊ । काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के पूर्व कुलपति डा. लालजी सिंह का रविवार की शाम निधन हो गया। वे 70 साल के थे। हैदराबाद जाने के लिए वे रविवार शाम बावतपुर हवाईअड्डे पर पहुंचे थे। इसी दौरान उन्हें ह्रदयाघात हुआ।

उन्हें बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। लालजी सिंह 2011 से 2014 तक बीएचयू के कुलपति रहे थे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रवक्ता राजेश सिंह ने बताया कि सिंह जौनपुर जिले के ब्लॉक सिकरारा कलवारी गांव के रहने वाले थे। वे तीन पहले ही अपने गांव गए थे।


गौरतलब है कि लालजी सिंह को डीएनए फिंगर प्रिंट का जनक के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने जिनोम नामक एक संस्था बनाई है जो कलवारी में रिसर्च का कार्य करती है। डा. सिंह वर्तमान में सीसीएमबी, हैदराबाद के निदेशक पद पर कार्यरत थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बहुचर्चित दिल्ली के तंदूर हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में अहम योगदान दिया था।

 


डा. सिंह के योगदान को इसी प्रकार समझा जा सकता है कि उन्होंने देश के सबसे चर्चित राजीव गांधी मर्डर केस, स्वामी श्रद्धानंद, नैना साहनी मर्डर, मधुमिता हत्याकांड, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और मंटू हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में अहम योगदान दिया था।
भारतीय इतिहास में पहली बार अपराध जांच को एक नई दिशा देने वाले सिंह साहब ने 1988 में डीएन की नई तकनीक की खोज कर सबको चौंका दिया था। वे बचपन में पढ़ाई के लिए 12 किलोमीटर तक पैदल ही स्कूल जाया करते थे। उनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था।
लालजी सिंह ने 26 अगस्त 2011 को बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के कुलपति के रूप में कार्यभार संभाला। उन्होंने अगस्त 2014 तक तीन सालों के दौरान केवल एक रूपए तनख्वाह के रूप में लेते रहे।
उनके निधन पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गहरा दु:ख व्यक्त करते किया। उन्होेंने कहा कि सिंह के निधन से देश ने एक प्रखर शिक्षक वक उच्च कोटी का विद्वान खो दिया है।

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